आभासी ही रह गया मुंशीजी का संग्रहालय, उम्मीदों के पूरा होने के इंतजार में कथा सम्राट की लमही
कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद का गांव लमही आज भी उम्मीदों के पूरा होने का इंतजार कर रही है। मुंशी जी के पैतृक आवास और वर्तमान स्मारक को आभासी संग्रहालय बनाने की घोषणा की गई लेकिन साल भर बीतने के बाद भी वह अभी तक आभासी ही है। घोषणाएं जमीन पर नहीं उतर सकी हैं। शहर से करीब पांच किलोमीटर की दूरी पर लमही गांव बसा है, जहां मुंशी प्रेमचंद का जन्म हुआ।
इस अमर कथाकार की याद में इस गांव को आज एक नया कलेवर दे दिया गया है, जैसे ही आप लमही गांव के द्वार पर पहुंचेंगे गोदान के होरी धनिया, पूस की रात का हलकू, बूढ़ी काकी और ईदगाह का हामिद चिमटा लिए आपको अपनी दादी के साथ बैठा नजर आ जाएगा। गांव के प्रवेश द्वार को देखते ही इन किरदारों के जनक की छाप आपको साफ महसूस होने लगेगी।
इस द्वार से प्रवेश करेंगे तो कहीं से भी आपको ये गांव-गांव जैसा नजर नहीं आएगा। द्वार से तकरीबन डेढ़ किलोमीटर चलने पर सामने आपको मुंशी जी का पैतृक आवास नजर आएगा। वहीं ठीक दूसरी ओर बीएचयू का मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल रिसच सेंटर। पैतृक आवास जिनकी खिड़कियां, बारजे, छोटे-छोटे कमरे आज उजली रंगत में चमक रहे हैं। जिस घर में कभी प्रेमचंद ने अपनी कालजयी रचनाएं गढ़ीं।
कभी न भूलने वाले किरदारों को जना, उसे न जाने कितने साल से म्यूजियम बनाने की तैयारी चल रही है। मुंशी जी की 125वीं जयंती पर उनके आवास को म्यूजियम बनाने का दावा किया गया था लेकिन इन सालों में उधड़ चुकी दीवारों की मरम्मत कर उन पर पुताई ही हुई है। 2019 में भी चार करोड़ 80 लाख रुपये से संग्रहालय बनाने की घोषणा तत्कालीन जिलाधिकारी ने की। साल बीतने को है लेकिन धरातल पर घोषणाओं की एक ईंट तक नहीं रखी गई।
मुंशी जी के घर के ठीक सामने आलीशान मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल रिसर्च सेंटर का ठूंठ भवन खड़ा है। ठूंठ इसलिए क्योंकि यह भवन अपनी सार्थकता सिद्ध नहीं कर पा रहा। केंद्र सरकार की पहल पर इस रिसर्च सेंटर की स्थापना इस उद्देश्य से की गई कि यहां मुंशी प्रेमचंद पर उनके उपन्यास, कहानियों और किरदारों पर शोध हो सके। चार साल बीतने के बाद भी शोध तो छोड़िए पुस्तकालय में तो किताबें तक नहीं हैं।
कथा सम्राट की जयंती के पूर्व अधिकारी सक्रिय हो जाते हैं लेकिन इस बार कोरोना संक्रमण के कारण जन्मस्थली के सारे आयोजन आनलाइन हो गए हैं। प्रेमचंद स्मारक न्यास लमही के अध्यक्ष सुरेश चंद्र दुबे कहते हैं कि हर बार घोषणाएं होती हैं लेकिन जमीन पर आज तक कोई बदलाव नजर नहीं आया है।