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Mukhtar Ansari: 'गलत तरीके से लाइसेंस प्राप्त करना बहुत बड़ा खतरा'; इन अफसरों की गवाही से मुख्तार को मिली सजा

Thu, 14 Mar 2024 02:26 PM IST
शाहरुख खान अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी Published by: शाहरुख खान Updated Thu, 14 Mar 2024 02:26 PM IST
सार

एमपी/एमएलए कोर्ट वाराणसी ने नौ महीने बाद ही मुख्तार अंसारी को दूसरी बार उम्रकैद की सजा सुनाई है। पहले अवधेश राय हत्याकांड में सजा सुनाई थी। अब गाजीपुर के फर्जी शस्त्र लाइसेंस मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई है। 

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Mukhtar Ansari got punishment due to the testimony of IAS and IPS officers
Mukhtar Ansari - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

गाजीपुर के फर्जी शस्त्र लाइसेंस मामले में माफिया मुख्तार अंसारी को सजा दिलाने में आईएएस और आईपीएस अधिकारियों की गवाही महत्वपूर्ण रही है। तत्कालीन जिलाधिकारी आलोक रंजन यूपी के मुख्य सचिव बनकर सेवानिवृत्त हुए, लेकिन अदालत में उपस्थित होकर गवाही दी। 
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इसी तरह गाजीपुर के तत्कालीन एसपी देवराज नागर यूपी के डीजीपी बने और सेवानिवृत्त हो गए। उन्होंने भी गवाही दी। वाराणसी की अदालत भी आए। अदालत ने अपने आदेश में आला अफसरों की गवाही और उनके तर्क का हवाला भी दिया है। अदालत ने कहा कि आला अफसरों के फर्जी हस्ताक्षर बनाना और उसपर शस्त्र लाइसेंस लेना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।
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गाजीपुर तत्कालीन जिलाधिकारी आलोक रंजन ने कहा कि वर्ष 1985-86-87 में जिलाधिकारी पद पर तैनात था। उस दौरान मुख्तार अंसारी, रामबहादुर सिंह, अब्दुल वजीद, सैय्यद मुहम्मद इजराइल आदि के शस्त्र लाइसेंस स्वीकृत नहीं किए थे। हस्ताक्षर मेरे नहीं थे। किसी ने षडयंत्र और धोखाधड़ी करके फर्जी ढंग से बनाए हैं। घटना के बाबत विवेचक ने मेरा बयान लिया था।
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गाजीपुर के तत्कालीन पुलिस अधीक्षक देवराज नागर ने कहा कि 1986-87 तक गाजीपुर में पुलिस अधीक्षक के पद पर नियुक्त था। मुख्तार के शस्त्र लाइसेंस पर मेरा कूटरचित हस्ताक्षर बनाया गया था। मुख्तार के शस्त्र लाइसेंस के आवेदन पत्र पर कोई हस्ताक्षर नहीं किया था। सीबीसीआईडी के विवेचक ने मेरा बयान लिया था।

इनकी गवाही भी अहम
वर्ष 1988 से 89 तक जिलाधिकारी के पद पर तैनात था। इस दौरान मालूम चला कि मुख्तार समेत पांच छह लोगों ने अवैध तरीके से शस्त्र लाइसेंस लिया है। इसकी जांच अपने एडीएम श्रीदुबे से कराया। कलेक्ट्रेट के कुछ कर्मियों की मिलीभगत सामने आईं। इसके बाद अभियुक्तों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। इस प्रकरण की विस्तृत जांच के लिए शासन को भी पत्र लिखा था। -जगन मैथ्यूज, तत्कालीन जिलाधिकारी, गाजीपुर

वर्ष 2003-04 के दौरान सीबीसीआईडी सेक्टर वाराणसी में बतौर पुलिस निरीक्षक कार्यरत था। विवेचना के दौरान पाया कि अभियुक्त मुख्तार अंसारी के विरुद्ध धारा 30 आर्म्स एक्ट का मुकदमा बनता होता है। -विश्वभूषण सिंह, तत्कालीन इंस्पेक्टर, सीबीसीआईडी

वर्ष 1990 को अपराध शाखा, अपराध अनुसंधान विभाग वाराणसी में बतौर खंडाधिकारी तैनात था। जांच के दौरान जिलाधिकारी जगन मैथ्यूज को अवगत कराया कि मुख्तार अंसारी के नाम से जारी डीबीबीएल गन पर उनके हस्ताक्षर फर्जी हैं। -अशफाक अहमद, खंडाधिकारी, अपराध शाखा, अपराध अनुसंधान विभाग

 

गलत तरीके से लाइसेंस प्राप्त करना बहुत बड़ा खतरा
अदालत की ओर से कहा गया कि गलत तरीके से शस्त्र लाइसेंस प्राप्त करना सामाजिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बहुत बड़ा खतरा है। अपराध की गंभीरता है। इसे विशिष्ट श्रेणी में रखते हुए अधिक दंड दिया जाना आवश्यक है। अभियोजन की ओर से एडीजीसी विनय कुमार सिंह और अभियोजन अधिकारी उदय राज शुक्ला ने पक्ष रखा। अभियोजन पक्ष के मुताबिक मुख्तार अंसारी ने 10 जून 1987 को दोनाली बंदूक के लाइसेंस के लिए गाजीपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी के यहां प्रार्थना पत्र दिया था।

बाद में जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक के फर्जी हस्ताक्षर से संस्तुति प्राप्त करते हुए मुख्तार ने शस्त्र लाइसेंस प्राप्त कर लिया था। फर्जीवाड़ा उजागर होने के बाद सीबीसीआईडी ने गाजीपुर के मोहम्मदाबाद थाने में मुख्तार अंसारी, तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर समेत पांच नामजद और अन्य अज्ञात के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था।

 

जांच के बाद तत्कालीन आयुध लिपिक गौरीशंकर श्रीवास्तव और मुख्तार अंसारी के विरुद्ध 1997 में आरोप पत्र अदालत में दाखिल किया गया था। सुनवाई के दौरान गौरीशंकर की मृत्यु होने के कारण उसके विरुद्ध 18 अगस्त 2021 को मुकदमा समाप्त कर दिया गया। अब अंतरराज्यीय गिरोह के सरगना और माफिया मुख्तार अंसारी को चार अलग-अलग धाराओं में दर्ज मुकदमे सजा सुनाई गई है। जुर्माना भी लगाया गया है।
 

बचाव पक्ष की दलील... घटना तब की जब अभियुक्त 22 वर्ष का था
मुख्तार अंसारी के अधिवक्ता श्रीनाथ त्रिपाठी ने कहा कि घटना वर्ष 1986-87 की है। तब अभियुक्त की उम्र लगभग 22 वर्ष की रही होगी। उस समय के आपराधिक इतिहास को विचारित किया जा सकता है, जबकि उक्त वर्ष का कोई भी आपराधिक इतिहास अभियुक्त का नहीं है। अतः ऐसी दशा में घटना के बाद दर्शित समस्त आपराधिक प्रकरणों को दंड के प्रश्न पर विचारित नहीं किया जा सकता है।

2005 से ही जेल में है मुख्तार
माफिया मुख्तार अंसारी 25 अक्तूबर 2005 से जेल की सलाखों के पीछे है। इस तरह से वह 18 वर्ष चार माह से ज्यादा समय से जेल में ही निरुद्ध है।

 

मऊ सदर से पांच बार रहा विधायक, पत्नी पर इनाम
मऊ सादर विधानसभा क्षेत्र से पांच बार विधायक रहा मुख्तार अंसारी का एमएलए बेटा अब्बास अंसारी भी जेल की सलाखों के पीछे ही है। मुख्तार की पत्नी अफशां पर गाजीपुर और मऊ जिले की पुलिस ने 75 हजार रुपये का इनाम घोषित कर रखा है। अफशां लंबे समय से फरार चल रही है। मुख्तार का छोटा बेटा उमर अंसारी भी फरार है।

 

मुख्तार के गिरोह के 297 बदमाशों के खिलाफ 161 मुकदमे, पांच मुठभेड़ में मारे गए
माफिया मुख्तार अंसारी गिरोह के 297 बदमाशों को चिन्हित करके उनके खिलाफ 161 मुकदमे दर्ज किए गए हैं। माफिया से संबंधी 175 लाइसेंसी शस्त्र धारकों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। गैंग से संबंधित पांच बदमाश पुलिस मुठभेड़ में मारे गए हैं। मुख्तार अंसारी के गैंग से संबंधित 164 बदमाशों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट और छह के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के अंतर्गत कार्रवाई करते हुए लगभग 608 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की संपत्ति जब्त/ध्वस्त की गई है। मुख्तार के 215 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के अवैध व्यवसाय को पुलिस और प्रशासन ने बंद कराया है।
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