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मुहर्रम: 1965 से सजी है नगीने वाली ताजिया, वाराणसी में बदले मार्ग से कर्बला पहुंचीं ताजिया; फोर्स तैनात

Fri, 26 Jun 2026 08:31 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Fri, 26 Jun 2026 08:31 PM IST
सार

Varanasi News: मुहर्रम पर ताजिया जुलूस शांतिपूर्ण माहौल में निकाला गया। सुरक्षा व्यवस्था के मद्देनजर प्रशासन पूरी तरह सतर्क रहा। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी लगातार निगरानी करते रहे। विभिन्न इलाकों से निकले ताजिए निर्धारित मार्गों से होते हुए कर्बला पहुंचे, जहां पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ ताजियों को ठंडा किया गया। श्रद्धालुओं ने इमाम हुसैन की शहादत को याद कर मातम किया।

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Muharram gem-studded Tazia adorned since 1965 Varanasi Tazia reached Karbala via an altered route
मंडुवाडीह स्थित दरगाह में रखी ताजिया। - फोटो : संवाद

विस्तार

Varanasi News: कर्बला के शहीदों की याद में मनाए जाने वाले मुहर्रम पर शनिवार को वाराणसी में अकीदत, मातम और गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल देखने को मिली। पहली बार आदमपुर थाना क्षेत्र में मुहर्रम के जुलूस का मार्ग परिवर्तन किया गया। लाटभैरव ओवरब्रिज से होते हुए ताजिए कर्बला तक पहुंचाए गए, जहां पारंपरिक रीति से उनका 'ठंडा' किया गया। पूरे मार्ग पर सुरक्षा, साफ-सफाई और पेयजल जैसी व्यवस्थाएं की गई थीं। शहर में शांति और सौहार्द के माहौल में मुहर्रम के जुलूस संपन्न हुए।

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आदमपुर के जोनल अधिकारी एवं सहायक नगर आयुक्त पवन कुमार गुप्ता ने बताया कि क्षेत्र में करीब नौ कर्बला बनाए गए हैं। नगर निगम की ओर से सभी स्थानों पर विशेष साफ-सफाई, स्प्रिंकलर और अन्य जरूरी व्यवस्थाएं की गईं ताकि ताजिएदारों और अकीदतमंदों को किसी तरह की परेशानी न हो।

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मुहर्रम के मद्देनजर पुलिस प्रशासन ने भी सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए। पूरे जनपद में करीब 5000 पुलिसकर्मी तैनात किए गए। शहर में रखे गए 810 ताजियों और निकाले गए 217 जुलूसों की लगातार निगरानी की गई। संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त पुलिस बल लगाया गया और ड्रोन कैमरों व सीसीटीवी के जरिए पूरे आयोजन पर नजर रखी गई।

एडिशनल पुलिस कमिश्नर शिवहरि मीणा ने बताया कि सभी जुलूस निर्धारित मार्ग और समय के अनुसार निकाले जा रहे हैं। पुलिस, प्रशासन और आयोजकों के समन्वय से मुहर्रम का आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न कराया जा रहा है। उन्होंने लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तत्काल पुलिस को देने की अपील की। उन्होंने कहा कि कानून व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

शहर का सबसे बड़ा जुलूस सरैया क्षेत्र से निकला, जिसमें शिया समुदाय के हजारों अकीदतमंद शामिल हुए। 'या हुसैन' की सदाओं के बीच लोगों ने मातम कर कर्बला के शहीदों को खिराज-ए-अकीदत पेश की। पूरे मार्ग पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम रहे और पुलिस अधिकारी लगातार मौके पर मौजूद रहे।

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मुहर्रम इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना है, लेकिन इसकी सबसे बड़ी पहचान कर्बला की उस ऐतिहासिक घटना से है, जब हजरत इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों ने अन्याय और अत्याचार के सामने झुकने के बजाय सत्य, इंसाफ और इंसानियत की रक्षा के लिए अपनी शहादत दी। यही कारण है कि मुहर्रम केवल शोक का पर्व नहीं, बल्कि त्याग, सब्र, न्याय और मानवता के मूल्यों का संदेश देने वाला अवसर भी माना जाता है।

इसी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए आदमपुर के पठानी टोला की 'नगीने वाली ताजिया' आज भी लोगों की विशेष आस्था का केंद्र बनी हुई है। वर्ष 1965 में इसे हाजी मोहम्मद उमर साहब ने अपने परिवार के लोगों के साथ मिलकर बनाया था। तब से लगातार सजाई जा रही यह ताजिया अपनी बारीक कारीगरी और रंग-बिरंगे नगीनों की सजावट के कारण पूरे शहर में अलग पहचान रखती है। मुहर्रम के दौरान चार दिनों तक यहां हजारों अकीदतमंद दर्शन के लिए पहुंचते हैं। स्थानीय लोग इसे बनारस की साझा संस्कृति, पारंपरिक शिल्पकला और भाईचारे का जीवंत प्रतीक मानते हैं।

पठानी टोला के अजीजुर्रहमान ने बताया कि नगीने वाली ताजिया हमारे बुजुर्गों की विरासत है। पिछले छह दशकों से इसकी परंपरा बिना रुके चली आ रही है। हर साल लोग दूर-दूर से इसे देखने आते हैं। यह सिर्फ एक ताजिया नहीं, बल्कि हमारी आस्था और काशी की तहजीब की पहचान है।

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मोहम्मद सोनू ने कहा कि मुहर्रम हमें कर्बला की कुर्बानी और इमाम हुसैन के बताए रास्ते पर चलने की सीख देता है। यहां हर धर्म और समुदाय के लोग ताजिया देखने आते हैं। यही बनारस की असली पहचान है, जहां मोहब्बत और भाईचारे की परंपरा आज भी कायम है।

अलीबकर ने बताया कि नगीने वाली ताजिया की सजावट महीनों पहले शुरू हो जाती है। इसे बनाने में पारंपरिक हुनर और बेहद बारीक कारीगरी का इस्तेमाल होता है। हमारी कोशिश रहती है कि पूर्वजों की इस विरासत को उसी सम्मान और खूबसूरती के साथ आगे बढ़ाया जाए।

मुहर्रम के अवसर पर वाराणसी ने एक बार फिर यह साबित किया कि यहां धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत एक-दूसरे की पूरक हैं। मातमी जुलूसों, ताजियों की परंपरा, प्रशासन की सतर्क व्यवस्था और विभिन्न समुदायों की सहभागिता ने काशी की गंगा-जमुनी तहजीब को फिर से जीवंत कर दिया।

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