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Mother's Day 2024: काशी के 60 हजार बच्चों को जीवन दे रही हैं मां गंगा, इन लोगों की पूरे साल कराती हैं नैया पार
Sun, 12 May 2024 09:44 AM IST
प्रगति चंद
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
Published by: प्रगति चंद
Updated Sun, 12 May 2024 09:44 AM IST
सार
काशी में मां की तरह 60 हजार से ज्यादा बच्चों को मां गंगा जीवन दे रही हैं। गंगा किनारे बसे तीर्थ पुरोहित, मल्लाह, वेदपाठी बटुकों के सुबह की शुरुआत मां गंगा के साथ ही होती है और संध्या के दिन की पूर्णता।
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वाराणसी गंगा घाट
- फोटो : रोहित सोनकर
विस्तार
गंगा सनातनी संस्कृति की जीवन रेखा हैं। काशी में बहती उत्तर वाहिनी गंगा अर्थव्यवस्था का मेरुदंड और भारतीय अध्यात्म का सार हैं। अस्सी से राजघाट के बीच में 60 हजार से ज्यादा लोग गंगा पर आश्रित हैं। तीर्थ पुरोहित, मल्लाह, वेदपाठी बटुकों के सुबह की शुरुआत मां गंगा के साथ ही होती है।
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मुक्तिदायिनी गंगा में स्नान के साथ ही दिन की शुरुआत होती है और संध्या के साथ दिन की पूर्णता। मल्लाहों की जीविका भी गंगा में नौकायन पर आधारित है। वहीं तीर्थपुरोहित भी 12 महीने गंगा के तट पर आने वाले श्रद्धालुओं के कर्मकांड से जुड़े हुए हैं। 145 एमएलडी गंगाजल पानी की सप्लाई के जरिये काशी की एक तिहाई से अधिक आबादी के घर में पहुंचता है।
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जयशंकर प्रसाद की रचना कामायनी से
केतकी गर्भ-सा पीला मुँह, आँखों में आलस-भरा स्नेह;
कुछ कृशता नई लजीली थी, कंपित लतिका-सी लिए देह!
मातृत्व बोझ से झुके हुए, बंध रहे पयोधऱ पीन आज;
कोमल काले ऊनों की नव, पट्टिका बनाती रुचिर साज।
सोने की सिकता में मानो, कालिंदी बहती भर उसास;
स्वर्गंगा में इंदीवर की, या एक पंक्ति कर रही ह्रास!
कटि में लिपटा था नवल वसन, वैसा ही हलका बुना नील;
दुर्भर थी गर्भ मधुर पीड़ा, झेलती जिसे जननी सलील।
श्रम-बिंदु बना सा झलक रहा, भावी जननी का सरस गर्व;
बन कुसुम बिखरते थे भू पर, आया समीप था महा पर्व।
मनु ने देखा जब श्रद्धा का, वह सहज खेद से भरा रूप,
अपनी इच्छा का दृढ़ विरोध, जिसमें वे भाव नहीं अनूप।
कुछ कृशता नई लजीली थी, कंपित लतिका-सी लिए देह!
मातृत्व बोझ से झुके हुए, बंध रहे पयोधऱ पीन आज;
कोमल काले ऊनों की नव, पट्टिका बनाती रुचिर साज।
सोने की सिकता में मानो, कालिंदी बहती भर उसास;
स्वर्गंगा में इंदीवर की, या एक पंक्ति कर रही ह्रास!
कटि में लिपटा था नवल वसन, वैसा ही हलका बुना नील;
दुर्भर थी गर्भ मधुर पीड़ा, झेलती जिसे जननी सलील।
श्रम-बिंदु बना सा झलक रहा, भावी जननी का सरस गर्व;
बन कुसुम बिखरते थे भू पर, आया समीप था महा पर्व।
मनु ने देखा जब श्रद्धा का, वह सहज खेद से भरा रूप,
अपनी इच्छा का दृढ़ विरोध, जिसमें वे भाव नहीं अनूप।
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मां पर श्लोक
''''नास्ति मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः। नास्ति मातृसमं त्राण, नास्ति मातृसमा प्रिया।। अर्थात, माता के समान कोई छाया नहीं है, माता के समान कोई सहारा नहीं है। माता के समान कोई रक्षक नहीं है और माता के समान कोई प्रिय चीज नहीं है।
नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः। नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा॥ भावार्थ-माता के समान कोई छाया नहीं, कोई आश्रय नहीं, कोई सुरक्षा नहीं। माता के समान इस विश्व में कोई जीवनदाता नहीं॥
''''रजतिम ओ गुरु तिय मित्रतियाहू जान।
निज माता और सासु ये, पाँचों मातृ समान।।'''' अर्थात, जिस प्रकार संसार में पांच प्रकार के पिता होते हैं, उसी प्रकार पांच प्रकार की मां होती हैं। जैसे, राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, अपनी स्त्री की माता और अपनी मूल जननी माता।
नास्ति मातृसमा छाया नास्ति मातृसमा गतिः। नास्ति मातृसमं त्राणं नास्ति मातृसमा प्रपा॥ भावार्थ-माता के समान कोई छाया नहीं, कोई आश्रय नहीं, कोई सुरक्षा नहीं। माता के समान इस विश्व में कोई जीवनदाता नहीं॥
''''रजतिम ओ गुरु तिय मित्रतियाहू जान।
निज माता और सासु ये, पाँचों मातृ समान।।'''' अर्थात, जिस प्रकार संसार में पांच प्रकार के पिता होते हैं, उसी प्रकार पांच प्रकार की मां होती हैं। जैसे, राजा की पत्नी, गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, अपनी स्त्री की माता और अपनी मूल जननी माता।