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मदर्स डे स्पेशल : बेटे के सपनों के लिए तोड़ दी परंपराओं की बेड़ियां
amarujala.com- Written by: जयेंद्र चतुर्वेदी
Updated Sun, 14 May 2017 06:28 PM IST
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चंद्रकला रावत
- फोटो : अमर उजाला
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परिवार ने साथ नहीं दिया, पति ने भी हौसला नहीं बढ़ाया लेकिन इस मां ने हिम्मत नहीं हारी। अपने बेटे की बेहतर जिंदगी के लिए घर-परिवार सब छोड़कर सही राह चुनने का फैसला किया। ओबरा (सोनभद्र) के एक गांव में ब्याही चंद्रकला रावत अपने दिव्यांग बेटे रुद्राक्ष के लिए ससुराल छोड़कर वाराणसी चली आईं।
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आज वे अपने फैसले से संतुष्ट हैं। बेटे को तो सही दिशा मिली ही, चंद्रकला उसके जैसे कई बच्चों की एजुकेटर बनकर उनका जीवन भी संवार रही हैं। बीएचयू की छात्रा रह चुकी चंद्रकला ने शादी के बाद पहले बेटी को जन्म दिया। इसके कुछ साल बाद बेटा हुआ।
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जैसे-जैसे वह बड़ा होने लगा उसकी शारीरिक अक्षमताएं देख वह चिंतित हो उठीं। परिवार वालों और पति ने भी इसे पिछले जन्मों का फल मानकर संतोष कर लिया लेकिन मां भला चुपचाप कैसे सह लेती। परिवार वालों को बिना बताए बेटे को लेकर वे डॉक्टर के पास गईं तो बता चला कि वह दिव्यांग है।
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अब उसके भविष्य को लेकर परेशान मां ने पति से बनारस चलकर उसे पढ़ाने-लिखाने की बात कही पर उनका यह प्रस्ताव ठुकरा दिया गया। चंद्रकला के सामने एक तरफ परिवार था तो दूसरी तरफ उनके बेटे का भविष्य।
उन्होंने दिल मजबूत किया और बेटे का भविष्य बेहतर बनाने के लिए अकेले ही बनारस आने का निर्णय लिया। उसे लेकर वह कमच्छा में देवा इंटरनेशनल के डॉ. तुलसी से मिलीं। उन्होंने बच्चे को विशिष्ट बच्चों के स्कूल में भर्ती कराया। वहां अपने बेटे जैसे कई और मासूमों को देखा।
तभी चंद्रकला ने ठान लिया कि वह यहीं रहकर बच्चों को पढ़ाएंगी और उन्हें दूसरों के बराबर खड़े होने में पूरी मदद करेंगी। पिछले पांच साल से चंद्रकला उसी स्कूल में स्पेशल एजुकेटर की जिम्मेदारी निभा रही हैं।
बाद में उनके पति को भी गलती का एहसास हुआ। आज चंद्रकला के हौसले की बदौलत उनका नौ साल का बेटा और नौवीं कक्षा में पढ़ने वाली बेटी तो खुश हैं ही, उनके चेहरे पर भी संतोष की चमक है।