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शिवपुर में नहीं उठा दुलदुल का जुलूस, हुई मजलिस

Sun, 23 Aug 2020 12:48 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 23 Aug 2020 12:48 AM IST
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moharram juloos canceled in varanasi
मुहर्रम पर शिवपुर में उठने वाला दुलदुल का जुलूस नहीं निकला। परंपरा कायम रखने के लिए मजलिस करके लोगों ने अलम की जियारत की। शहर में कई जगहों पर आयोजित मजलिसों में शामिल होने वालों की संख्या भी सीमित रही। दुआख्वानी के दौरान मुल्क से कोरोना के खात्मे की दुआएं की जा रही हैं। शनिवार को दूसरे मुहर्रम पर शिवपुर में अंजुमन पंजेतानी द्वारा पिछले 40 सालों से उठाया जा रहा अलम का जुलूस नहीं उठाया गया।
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शहर में जगह-जगह सुबह 8 बजे से मजलिसों का दौर शुरू हो गया। वहीं घरों में भी लोगों ने अलम, ताजिया और ताबूत सजा लिया है। इमाम चौक पर कोरोना संक्रमण के कारण ताजिया नहीं रखा गया है। यहां इमाम हुसैन का परचम लहराकर रोजाना दुआख्वानी के साथ ही लोग चिराग भी रौशन कर रहे हैं। शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता हाजी फरमान हैदर ने बताया कि दो मोहर्रम को ही सन 61 हिजरी में इमाम हुसैन कर्बला पहुंचे थे और उन्होंने वहां जमीन खरीदी थी। उन्होंने केवल जुल्म के खिलाफ और इंसानियत को बचाने के लिए जंग लड़ी। इसके लिए उन्हें बहुत बड़ी कुर्बानी देनी पड़ी थी। उनका छह महीने का बेटा,18 साल का बेटा, 25 साल का भाई और उनके 54 साथी कर्बला में शहीद हुए थे। आज भी वह शहीद जिंदा हैं और उनकी शहादत को पूरी दुनिया याद करती है।
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कोरोना संक्रमण के कारण नहीं सजेगा ताजिया अमर उजाला ब्यूरो देखने में बिल्कुल मंदिर की बनावट। मगर है ताजिया। अकीदत ऐसी कि मुस्लिम ही नहीं बल्कि हिंदू भाई भी लगाते हैं हाजिरी। जी हां बात हो रही है हरिश्चंद्र घाट स्थित एक ऐसे इमामबाड़े व उसमें स्थापित ताजिए की जिसके वजूद की कहानी एक कुम्हार की श्रद्धा से जुड़ी है। कुम्हार के अटूट विश्वास के कारण ही इस इमामबाड़े का नाम कुम्हार का इमामबाड़ा पड़ा। इसमें स्थापित ताजिया शहर के अन्य ताजियों से अलग है। इसकी बनावट बिल्कुल मंदिर की तरह है। यहां एक ओर शिया मुस्लिम जहां मजलिस करते हैं, वहीं हिंदू भाई हाथ जोड़कर अकीदत से फूल चढ़ाते हैं। मुहर्रम नजदीक आते ही आस-पास के ही हिंदू भाई इसकी साफ.सफाई और रंग-रोगन का काम कराते हैं। कोरोना संक्रमण के कारण इस बार यह ताजिया नहीं सज रहा है।
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हरिश्चंद्र घाट स्थित कुम्हार का इमामबाड़ा लगभग 150 वर्ष पुराना है। इसकी देखरेख एक हिंदू कुम्हार परिवार कर रहा है तो वहीं सरपरस्ती शिया वर्ग के हाथ है। इमामबाड़े के मुतवल्ली बताते हैं कि करीब 150 वर्ष पहले इमामबाड़े के पास ही एक हिंदू कुम्हार परिवार रहता था। उसका एक बेटा था। जो हर वर्ष मुहर्रम पर मिट्टी की ताजिया बनाता था। पिता ने पहले तो बच्चे को ताजिया बनाने से मना किया। वह जब नहीं माना तो उसकी खूब पिटाई की। इससे बच्चा इतना बीमार हुआ कि वैद्य, हकीम भी काम न आए। बेटे को लेकर पिता की चिंता बढने लगी। एक दिन कुम्हार ने सपने में देखा कि एक बुजुर्ग उसके सामने खड़े हैं। वह कह रहे हैं कि तेरा बेटा मुझसे अकीदत रखता है। तुमने उसे ताजिया बनाने से रोक दियाए तो वह बीमार पड़ गया है। अगर तुम्हें उससे मोहब्बत नहीं है तो मैं उसे अपने पास बुला लेता हूं। कुम्हार ने स्वप्न में ही अपनी गलती मानते हुए कहा कि बस एक बार आप मुझे माफ करके मेरे बच्चे को ठीक कर दें। इस पर बुजुर्ग ने कहा कि नींद से उठकर देख, तेरा बच्चा खेल रहा है। नींद से जगकर कुम्हार ने देखा कि जो बच्चा गंभीर रूप से बीमार था, वह न केवल पूरी तरह स्वस्थ थाए बल्कि बच्चों के साथ खेल भी रहा है।
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