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खामोशी से गुजरा मुहर्रम, दिलों में गूंजा या हुसैन
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यौमे आशूरा खामोशियों के साथ गुजर गया लेकिन हर दिल में या हुसैन की सदाएं गूंजती रहीं। शहर भर में निकलने वाले ताजिए के जुलूस स्थगित रहे तो केवल मजलिस और छोटे ताजियों को ठंडा करके मुहर्रम की दसवीं तारीख की रवायत अदा की गई। रविवार को यौमे आशूरा का दिन मुस्लिम समुदाय के लिए बेहद खास था। इसी दिन एक इस्लामी हुकूमत ने अपने नबी के खानदान के लोगों को घेर कर भूखा प्यास मार डाला।
जिले भर में उठने वाले तीन सौ से अधिक ताजिए तो नहीं उठे लेकिन शहर के इमामबाड़ों में छोट ताजिये तथा अलम व तुरबत के फूलों को ठंडा करके रवायत कायम रखी गई। सदर इमामबाड़ा, दरगाहे फातमान, शिवाला घाट, रामनगर टेंगरा मोड़ के इमामबाड़े में रवायत निभाई गई। इस दौरान पुलिस भी काफी संख्या में तैनात रही।
शहर में 8 जगह दुलदुल का जुलूस 27 अंजुमन उठाती हैं मगर उन सब जुलूसों की जगह छोटी-छोटी मजलिसें ही की गईं। देर रात तक जगह-जगह शाम ए गरीबां की मजलिसें हुई। इन मजलिसों में उस समय को याद किया गया जब 10 मोहर्रम की शाम को इमाम हुसैन की शहादत के बाद यजीद की फौज ने इमाम हुसैन के खेमे जला दिए। उनका सामान लूट लिया। औरतों और बच्चों को बंधक बना लिया।
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शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता हाजी फरमान हैदर ने बताया कि ये इमाम हुसैन की शहादत का 1382 वां साल था और हुसैनी कौम के लोग इसी तरह हर साल मोहर्रम मनाते रहेंगे। कर्बला का वा़केया रो कर मातम कर के बयान करके सुनाते रहेंगे ताकि फिर कोई बादशाह इस्लाम का नाम लेकर किसी पर भी जुल्म न कर पाए।
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जिले भर में उठने वाले तीन सौ से अधिक ताजिए तो नहीं उठे लेकिन शहर के इमामबाड़ों में छोट ताजिये तथा अलम व तुरबत के फूलों को ठंडा करके रवायत कायम रखी गई। सदर इमामबाड़ा, दरगाहे फातमान, शिवाला घाट, रामनगर टेंगरा मोड़ के इमामबाड़े में रवायत निभाई गई। इस दौरान पुलिस भी काफी संख्या में तैनात रही।
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शहर में 8 जगह दुलदुल का जुलूस 27 अंजुमन उठाती हैं मगर उन सब जुलूसों की जगह छोटी-छोटी मजलिसें ही की गईं। देर रात तक जगह-जगह शाम ए गरीबां की मजलिसें हुई। इन मजलिसों में उस समय को याद किया गया जब 10 मोहर्रम की शाम को इमाम हुसैन की शहादत के बाद यजीद की फौज ने इमाम हुसैन के खेमे जला दिए। उनका सामान लूट लिया। औरतों और बच्चों को बंधक बना लिया।
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शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता हाजी फरमान हैदर ने बताया कि ये इमाम हुसैन की शहादत का 1382 वां साल था और हुसैनी कौम के लोग इसी तरह हर साल मोहर्रम मनाते रहेंगे। कर्बला का वा़केया रो कर मातम कर के बयान करके सुनाते रहेंगे ताकि फिर कोई बादशाह इस्लाम का नाम लेकर किसी पर भी जुल्म न कर पाए।