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करते हैं मातम हम अब्बास का...
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वाराणसी। करते हैं मातम हम अब्बास का, हो गया मरना सितम अब्बास का...के मातमी नौहों से आठवीं मुहर्रम की शाम गूंज उठी। शहर में 72 शहीदों के उठने वाले ताबूत की रवायत बस मजलिस और नौहा मातम के जरिए मनाई गई।
शुक्रवार को कोरोना संक्रमण के कारण दालमंडी, चौहट्टा लाल खां, दोषीपुरा, मदनपुरा, शिवाला, अर्दली बाजार, रामनगर आदि में जुलूस की जगह मजलिसें करके ही लोगों ने रवायत निभाई। शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता हाजी फरमान हैदर ने बताया कि हजरत अब्बास हुसैनी सेना के सेनापति थे। अब्बास अपने दौर के ऐसे सिपाही थे जो तलवार और भाले के युद्ध में अकेले पूरी सेना को रोकने की ताकत रखते थे। ऐसा उन्होंने कर्बला की जंग से पहले कई जंगों में किया था। मगर कर्बला की जंग बिलकुल अलग नियम पर लड़ी जा रही थी इसमें इमाम हुसैन ने हजरत अब्बास को तलवार उठाने की इजाजत नहीं दी, बल्कि एक टूटा हुआ भाला और एक खाली मश्क दी और कहा कि यजीदी लश्कर ने नदी घेर रखा है जिसकी वजह से हमारे काफि ले के बच्चे 3 दिन से प्यासे हैं। उनके पानी का इंतजाम करो। लाखों के यजीदी लश्कर के सामने टूटे हुए भाले से लड़ते हुए भी अब्बास नदी तक पहुंच गए । अब्बास के साथ-साथ हुसैनी सेना का झंडा भी था। बच्चे अपनी प्यास बुझाने के लिए उस झंडे पर निगाह रखे थे कि उस झंडे के साथ हमारा पानी भी आ रहा होगा और जब वो झंडा नदी से वापिस आने लगा तो बच्चों की आस भी बढ़ गई। उन्हीं बच्चों में इमाम हुसैन की 4 साल की छोटी बच्ची सकीना भी थी। मगर वापसी में मश्क में तीर लगते ही सारा पानी बह गया और अब्बास की हिम्मत टूट गई और हमले ऐसे हुए कि उनके दोनों हाथ भी कट गए और वे शहीद हुए। अब्बास के अलम के गिरते ही बच्चों की उम्मीदें भी गिर गईं ।
पूरी दुनिया में उठाया जाता है अलम
अब्बास की शहादत तो कर्बला में हुई मगर जो अलम(झंडा) अब्बास के हाथों में कर्बला में था वो आज पूरी दुनिया में उठाया जाता है। जो जवान हाथ इस आलम को उठाते हैं वो भी वादा करते हैं कि कुछ हो जाए मगर मेरे मौला अब्बास की तरह जब तक मेरे बाजू सलामत हैं कोई बच्चा प्यासा न रहे । इसी अलम को 8 मोहर्रम की तारीख़ को बनारस में 10 से अधिक जुलूस में हर साल उठाया जाता है ।
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शुक्रवार को कोरोना संक्रमण के कारण दालमंडी, चौहट्टा लाल खां, दोषीपुरा, मदनपुरा, शिवाला, अर्दली बाजार, रामनगर आदि में जुलूस की जगह मजलिसें करके ही लोगों ने रवायत निभाई। शिया जामा मस्जिद के प्रवक्ता हाजी फरमान हैदर ने बताया कि हजरत अब्बास हुसैनी सेना के सेनापति थे। अब्बास अपने दौर के ऐसे सिपाही थे जो तलवार और भाले के युद्ध में अकेले पूरी सेना को रोकने की ताकत रखते थे। ऐसा उन्होंने कर्बला की जंग से पहले कई जंगों में किया था। मगर कर्बला की जंग बिलकुल अलग नियम पर लड़ी जा रही थी इसमें इमाम हुसैन ने हजरत अब्बास को तलवार उठाने की इजाजत नहीं दी, बल्कि एक टूटा हुआ भाला और एक खाली मश्क दी और कहा कि यजीदी लश्कर ने नदी घेर रखा है जिसकी वजह से हमारे काफि ले के बच्चे 3 दिन से प्यासे हैं। उनके पानी का इंतजाम करो। लाखों के यजीदी लश्कर के सामने टूटे हुए भाले से लड़ते हुए भी अब्बास नदी तक पहुंच गए । अब्बास के साथ-साथ हुसैनी सेना का झंडा भी था। बच्चे अपनी प्यास बुझाने के लिए उस झंडे पर निगाह रखे थे कि उस झंडे के साथ हमारा पानी भी आ रहा होगा और जब वो झंडा नदी से वापिस आने लगा तो बच्चों की आस भी बढ़ गई। उन्हीं बच्चों में इमाम हुसैन की 4 साल की छोटी बच्ची सकीना भी थी। मगर वापसी में मश्क में तीर लगते ही सारा पानी बह गया और अब्बास की हिम्मत टूट गई और हमले ऐसे हुए कि उनके दोनों हाथ भी कट गए और वे शहीद हुए। अब्बास के अलम के गिरते ही बच्चों की उम्मीदें भी गिर गईं ।
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पूरी दुनिया में उठाया जाता है अलम
अब्बास की शहादत तो कर्बला में हुई मगर जो अलम(झंडा) अब्बास के हाथों में कर्बला में था वो आज पूरी दुनिया में उठाया जाता है। जो जवान हाथ इस आलम को उठाते हैं वो भी वादा करते हैं कि कुछ हो जाए मगर मेरे मौला अब्बास की तरह जब तक मेरे बाजू सलामत हैं कोई बच्चा प्यासा न रहे । इसी अलम को 8 मोहर्रम की तारीख़ को बनारस में 10 से अधिक जुलूस में हर साल उठाया जाता है ।
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