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वाराणसी में सूदखोरों का मकड़जाल, सैकड़ों लोग मनमाने ब्याज दर पर उधार देते हैं पैसा, रखें इन बातों का ध्यान

Sat, 09 Jan 2021 01:46 AM IST
विचित्र सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: विचित्र सिंह Updated Sat, 09 Jan 2021 01:46 AM IST
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Many moneylenders lend money at arbitrary interest rate in Varanasi
सांकेतिक तस्वीर

वाराणसी के बेलवरिया निवासी सर्वेश ने सूदखोरों की प्रताड़ना से आजिज आकर छह जनवरी को शिवपुर क्षेत्र के भगवानपुर में ट्रेन के सामने कूद कर जान दे दी। सूदखोरों की प्रताड़ना से तंग आकर जान गंवाने की यह कोई नई घटना नहीं है। इसके बावजूद लोग सूदखोरों के जाल में फंसते ही रहते हैं और पुलिस-प्रशासन के अधिकारी मौन साधे रहते हैं।

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जिले में शहर से लेकर गांवों तक सूदखोरों का तगड़ा नेटवर्क है। इनकी नजर हमेशा जरूरतमंदों पर रहती है और इनके कारिंदे ऐसे लोगों की दुखती रग पर हाथ रखते हुए उन्हें अपने आका तक ले जाते हैं। अगर गिरवी रखने को कुछ न मिला, तब भी बनावटी दरियादिली दिखाते हुए कर्ज दिया जाता है। एक बार जिसने सूदखोरों से कर्ज ले लिया, फिर उससे उबरना आसान नहीं रहता। आखिर में उन्हें ब्याज चुका कर अपना सब कुछ गवां देना पड़ता है। 40 लाख से ज्यादा आबादी वाले जिले में कहने को तो लिखा पढ़ी में निर्धारित दर पर ब्याज पर पैसा देने वाले महज 51 साहूकार हैं। यह सभी बैंक की निर्धारित ब्याज दर की तरह ही पैसा उधार देते हैं। लेकिन हकीकत में मनमाना ब्याज दर पर पैसा उधार देने वालों की संख्या जिले में सैकड़ों में है। प्रतिमाह निर्धारित समय पर ब्याज और किश्त का पैसा न मिलने पर सूदखोर चक्रवृद्धि ब्याज वसूलते हैं और उधार लेने वाले के घर के कीमती सामान भी जबरन उठा ले जाते हैं। 

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डीरेका के कर्मचारी ने जहर खाकर जान देने की कोशिश की थी

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  • केस-1ः 2020 के आखिरी में लोहता के एक सूदखोर से आजिज आकर डीरेका के एक कर्मचारी ने जहर खाकर जान देने का प्रयास किया था। कर्मचारी का कहना था कि उसने एक जरूरी काम के लिए 15% ब्याज दर पर पैसा उधार लिया था। इसी बीच परिजनों की तबीयत खराब होने पर वह चार माह की किश्त नहीं दे पाया तो सूदखोर उसका जीना दूभर कर दिया था। अंतत: जब उसे लगा कि अब इज्जत नहीं बचेगी तो उसने जान देने का प्रयास किया था।

गंगा में छलांग लगाकर व्यापारी ने दे दी थी जान

  • केस-2: सूदखोरों के उत्पीड़न से आजिज आकर अगस्त 2019 में चितईपुर क्षेत्र की विश्वकर्मा नगर कॉलोनी निवासी व्यापारी ने शास्त्री पुल से गंगा में छलांग लगा दी थी। व्यापारी ने सुसाइड नोट में लिखा था कि तीन सूदखोरों के कारण आत्महत्या कर रहा हूं। सूदखोर हर महीने 40 प्रतिशत ब्याज लेता था। चार लाख की जगह 40 लाख दे चुका, लेकिन कर्ज खत्म ही नहीं हो रहा है। ऊपर से सूदखोर घर और दुकान आकर अलग से बेइज्जत करता है।

ब्याज और अपमान से आजिज व्यापारी ने दी थी जान

  • केस-3: अक्तूबर 2015 में हुकुलगंज निवासी पान के थोक व्यवसायी ने सूदखोरों से आजिज आकर राजघाट पुल से गंगा में छलांग लगा कर जान दे दी थी। आत्महत्या से पहले अपने करीबियों से व्यापारी का यही कहना था कि मूलधन कबका खत्म हो गया, लेकिन सूदखोर को ब्याज देकर और आए दिन उससे अपमानित होकर वह आजिज आ गया है। इस वजह से अब उसके सामने मौत के अलावा कोई अन्य दूसरा विकल्प नहीं है।

जिले में यह लोग आसानी से बनते हैं सूदखोरों के शिकार

जिले में नगर निगम व जिला पंचायत के सफाई कर्मी, बीएचयू, डीरेका व रेलवे के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी और ठेला-पटरी दुकानदार सूदखोरों के आसानी से शिकार बन जाते हैं। सूदखोर सरकारी कर्मियों की पासबुक अपने पास रखते हैं और हर माह तनख्वाह मिलने वाले दिन बैंक के सामने जाकर खड़े हो जाते हैं। तनख्वाह लेकर कर्मचारी जैसे ही बैंक से बाहर निकलता है वैसे ही सूदखोर ब्याज और महीने की किश्त का पैसा जबरन उससे ले लेते हैं। इसके अलावा जो ठेला-पटरी दुकानदार या अन्य प्रकार के जरूरतमंद रहते हैं, उनके जमीन और मकान के कागज गिरवी रखकर ब्याज पर पैसा सूदखोर देते हैं। सूद की दो से तीन किश्त न देने पर सूदखोर मकान या जमीन का रजिस्टर्ड सट्टा करने का दबाव उधार लेने वाले बनाने लगते हैं। इसके बाद उधार लेने वाले पर ऐसा मानसिक और सामाजिक दबाव बनाते हैं कि वह सूदखोर को अपनी जमीन या मकान रजिस्ट्री करने के लिए विवश हो जाता है।
 

कुछ इस तरह से फंस जाते हैं लोग सूदखोरों के जाल में

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सूदखोरों के जाल में आमजन के लोगों के फंसने की एक बड़ी वजह उनकी अज्ञानता और बैंकों की तमाम तरह की कागजी लिखापढ़ी की कवायद से बचना है। लंका में चाय की दुकान संचालित करने वाले बुजुर्ग दुकानदार ने शुक्रवार को बातचीत के दौरान बताया कि पिछले साल लॉकडाउन लगा तो चार माह के लिए गांव गए थे। वापस आए तो पैसा नहीं था। बैंक में कर्ज लेने जाते तो 72 तरह के कागज मांगे जाते और वह सब हम परदेश में भला कहां से दे पाते। ऐसे में पड़ोस के परिचित दुकानदार की मदद से 10 रुपये सैकड़ा की दर पर पांच हजार रुपये लिए। कुछ ऐसा ही हाल अन्य जरूरतमंदों का भी रहता है। वह बैंक से उधार लेने की बजाय अपने परिचित सूदखोर से पैसा लेना ज्यादा अच्छा समझते हैं।

आवश्यकता देख कर निर्धारित होती है 10 से 40 % तक ब्याज


ब्याज पर पैसा देते समय सूदखोर उधार लेने वाले की हैसियत और उसकी आवश्यकता देखते हैं। इसके बाद प्रतिमाह 10 से 40 प्रतिशत तक ब्याज दर पर पैसा उधार देते हैं। अब जैसे कि किसी की दुकान या धंधा अच्छा चल रहा है और वह किसी सूदखोर से अपनी किसी आवश्यकता के लिए एक बड़ी रकम कुछ महीनों के लिए उधार मांगता है तो उसकी ब्याज की दर ज्यादा रहेगी। शादी और बीमारी के उपचार आदि का हवाला देकर कोई पैसा उधार मांगता है तो उसके लिए भी ब्याज दर ज्यादा रहती है।

जिले में वर्षों से नहीं चला अभियान

सूदखोरों के खिलाफ जिले में पुलिस और प्रशासन के स्तर से वर्षों से कोई अभियान नहीं चलाया गया है। सूदखोरी से संबंधित कोई बड़ी घटना जब सामने आ जाती है तो पुलिस और प्रशासनिक महकमा थोड़ी सक्रियता दिखाता है। इसके बाद फिर सभी बेफिक्र हो जाते हैं। 

रखें इन बातों का ध्यान, रहेंगे सुरक्षित

  •  प्रयास यही करें कि सूदखोर से ब्याज पर पैसा उधार न लें।
  •  जरूरत पड़ने पर बैंक से ही पैसा उधार लें। अब बैंकों में कागजों आदि का बहुत ज्यादा तामझाम नहीं रह गया है। 
  •  सूदखोर से पैसा लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है तो ब्याज की दर और समयावधि तय कर लिखा पढ़ी कराएं।
  • सूदखोर परेशान करे तो तत्काल नजदीकी थाने या पुलिस अधिकारियों को सूचना दें। इसे लेकर कभी संकोच न करें।

 

जिले में यदि किसी को भी कोई सूदखोर परेशान कर रहा है तो वह इसकी शिकायत सीधे हमारे कार्यालय में या सीयूजी नंबर पर कर सकते हैं। सूदखोरों के चंगुल में फंसने से हमें खुद बचना चाहिए। ऐसे लोगों के बारे में सूचना अपने नजदीकी थाने या सीओ ऑफिस में भी दी जा सकती है। -अमित पाठक, एसएसपी, वाराणसी

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