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आस्था की अनोखी कहानी: जिसे दुनिया दिखाई नहीं देती, उसे याद है रामनगर की रामलीला का पूरा नक्शा
Thu, 08 Oct 2026 12:49 PM IST
Pragati Chand
अमरेंद्र पांडेय, पीडीडीयू नगर (चंदौली), संवाद न्यूज एजेंसी।
अमरेंद्र पांडेय, पीडीडीयू नगर (चंदौली), संवाद न्यूज एजेंसी।
Published by: Pragati Chand
Updated Thu, 08 Oct 2026 12:49 PM IST
सार
चंदौली निवासी मनोहर यादव को आंखों से नहीं दिखता लेकिन रामनगर की रामलीला का नक्शा उन्हें याद है। यही वजह है कि वह बीते 30 वर्षों के रामलीला के नेमी हैं। मनोहर रास्ते में आने वाली गंध, वातावरण और आवाजों से अंदाजा हो जाता है कि वह किस लीला स्थल पर पहुंच गए हैं।
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मनोहर यादव
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
यह किसी आश्चर्य से कम नहीं कि जिसे दुनिया नहीं दिखाई देती, उसे रामनगर की रामलीला का पूरा नक्शा याद है। चंदौली के कटेसर निवासी 40 वर्षीय मनोहर यादव बीते 30 वर्षों के रामलीला के नेमी हैं। हर दिन शाम पांच बजते ही वह घर से नंगे पांव निकल पड़ते हैं। न किसी का हाथ पकड़ते हैं और न किसी से रास्ता पूछते हैं।
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लीला स्थल का वातावरण और गंध उन्होंने खुद में ऐसे समाहित किया है कि चार-पांच किलोमीटर का सफर तय कर सीधे उस लीला स्थल तक पहुंच जाते हैं, जहां उस दिन की लीला होनी होती है।रामनगर किले से चार किलोमीटर के क्षेत्र में अलग-अलग स्थानों पर रामलीला होती है।
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अयोध्या, जनकपुर, पंचवटी, लंका, चित्रकूट, निषादराज आश्रम, अशोक वाटिका, सनक-सनंदन रामबाग, गिरजा मंदिर, पंपासर, बालि वध स्थल और रतनबाग समेत 12 से ज्यादा स्थानों पर रामचरित मानस के प्रसंगों के अनुसार लीला का मंचन होता है। मनोहर रास्ते में आने वाली गंध, वातावरण और आवाजों से अंदाजा हो जाता है कि वह किस लीला स्थल पर पहुंच गए हैं।
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दिखाई देता तो ध्यान भटक जाता, भगवान की आवाज साफ सुनाई देती है
मनोहर से जब पूछा गया कि उन्हें कुछ दिखाई ही नहीं देता तो रोज रामलीला देखने क्यों आते हैं? वह मुस्कुराकर कहते हैं, यह अच्छा है कि मुझे दिखाई नहीं देता। दिखाई देने से ध्यान भटक जाता। दिखाई नहीं देता इसलिए भगवान की मधुर आवाज स्पष्ट सुनाई देती है। उनकी बात में वर्षों की साधना और रामलीला के प्रति गहरी आस्था झलकती है। वह बताते हैं कि एक दिन गांव की गली में खड़े थे। तभी कुछ लोग रामनगर की रामलीला देखने जा रहे थे। मनोहर ने आवाज देकर पूछा कि कहां जा रहे हैं। लोगों ने बताया कि रामनगर की रामलीला देखने जा रहे हैं। मनोहर ने भी साथ चलने की जिद की। पहले लोगों ने कहा कि जब दिखाई नहीं देता तो रामलीला में जाकर क्या करोगे, लेकिन उनकी जिद पर उन्हें साथ ले लिया। मनोहर बताते हैं कि पहले दिन की रामलीला में भगवान का संवाद सुना तो ऐसा लगा जैसे आंखों के सामने प्रकाश छा गया हो। मन भीतर से प्रफुल्लित हो उठा। उस दिन के बाद चेहरे पर कभी उदासी नहीं आई। मुस्कुराहट जैसे उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गई।
इसे भी पढ़ें; युवा संवाद: '2047 क्यों 2026 तक क्यों नहीं?' जेन जी के सवाल पर नितिन नवीन ने दिया पीढ़ी परिवर्तन का जवाब
मनोहर से जब पूछा गया कि उन्हें कुछ दिखाई ही नहीं देता तो रोज रामलीला देखने क्यों आते हैं? वह मुस्कुराकर कहते हैं, यह अच्छा है कि मुझे दिखाई नहीं देता। दिखाई देने से ध्यान भटक जाता। दिखाई नहीं देता इसलिए भगवान की मधुर आवाज स्पष्ट सुनाई देती है। उनकी बात में वर्षों की साधना और रामलीला के प्रति गहरी आस्था झलकती है। वह बताते हैं कि एक दिन गांव की गली में खड़े थे। तभी कुछ लोग रामनगर की रामलीला देखने जा रहे थे। मनोहर ने आवाज देकर पूछा कि कहां जा रहे हैं। लोगों ने बताया कि रामनगर की रामलीला देखने जा रहे हैं। मनोहर ने भी साथ चलने की जिद की। पहले लोगों ने कहा कि जब दिखाई नहीं देता तो रामलीला में जाकर क्या करोगे, लेकिन उनकी जिद पर उन्हें साथ ले लिया। मनोहर बताते हैं कि पहले दिन की रामलीला में भगवान का संवाद सुना तो ऐसा लगा जैसे आंखों के सामने प्रकाश छा गया हो। मन भीतर से प्रफुल्लित हो उठा। उस दिन के बाद चेहरे पर कभी उदासी नहीं आई। मुस्कुराहट जैसे उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गई।
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आठ-दस दिन हाथ पकड़कर ले गए, फिर छोड़ दिया साथ
मनोहर बताते हैं कि शुरुआती आठ-दस दिनों तक गांव के लोग उनका हाथ पकड़कर रामलीला दिखाने ले गए। बाद में लोग साथ ले जाने से कतराने लगे। लेकिन, तब तक मनोहर को रामलीला का भक्ति रस मिल चुका था। शाम पांच बजते ही वह बेचैन हो जाते और बिना किसी सहारे के घर से निकल पड़ते। पहले वह आसपास के लोगों से रास्ता पूछते हुए लीला स्थल तक पहुंचे। चार-पांच साल में उन्होंने रामनगर की गलियों, रास्तों और लीला स्थलों के वातावरण को इस तरह अपने भीतर बसा लिया कि अब किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ती। आसपास की गंध, आवाज और वातावरण उनके लिए रास्ते की पहचान बन गए।
मनोहर बताते हैं कि शुरुआती आठ-दस दिनों तक गांव के लोग उनका हाथ पकड़कर रामलीला दिखाने ले गए। बाद में लोग साथ ले जाने से कतराने लगे। लेकिन, तब तक मनोहर को रामलीला का भक्ति रस मिल चुका था। शाम पांच बजते ही वह बेचैन हो जाते और बिना किसी सहारे के घर से निकल पड़ते। पहले वह आसपास के लोगों से रास्ता पूछते हुए लीला स्थल तक पहुंचे। चार-पांच साल में उन्होंने रामनगर की गलियों, रास्तों और लीला स्थलों के वातावरण को इस तरह अपने भीतर बसा लिया कि अब किसी सहारे की जरूरत नहीं पड़ती। आसपास की गंध, आवाज और वातावरण उनके लिए रास्ते की पहचान बन गए।
मैं भले भगवान को नहीं देख पाता, लेकिन भगवान तो मुझे जरूर देख लेते होंगे
करीब 30 वर्षों से लगातार लीला देखने और नेमी रहने के कारण वहां आने वाले अधिकांश लोग मनोहर को पहचानते हैं। वह जब लीला स्थल पर पहुंचते हैं तो लोग उन्हें अपने पास बैठा लेते हैं। कई लोग उनसे कहते हैं कि यदि उनकी आंखें होतीं तो भगवान की मनोहर छवि देखकर वह और आनंदित होते। इस पर मनोहर का जवाब भी उतना ही सहज होता है, ‘मैं भले भगवान को नहीं देख पाता, लेकिन भगवान तो मुझे जरूर देख लेते होंगे।’ मनोहर के लिए रामलीला सिर्फ मंचन देखने का अवसर नहीं, बल्कि जीवन में रोशनी का वह अनुभव है जो आंखों से नहीं, आस्था से महसूस होता है।
करीब 30 वर्षों से लगातार लीला देखने और नेमी रहने के कारण वहां आने वाले अधिकांश लोग मनोहर को पहचानते हैं। वह जब लीला स्थल पर पहुंचते हैं तो लोग उन्हें अपने पास बैठा लेते हैं। कई लोग उनसे कहते हैं कि यदि उनकी आंखें होतीं तो भगवान की मनोहर छवि देखकर वह और आनंदित होते। इस पर मनोहर का जवाब भी उतना ही सहज होता है, ‘मैं भले भगवान को नहीं देख पाता, लेकिन भगवान तो मुझे जरूर देख लेते होंगे।’ मनोहर के लिए रामलीला सिर्फ मंचन देखने का अवसर नहीं, बल्कि जीवन में रोशनी का वह अनुभव है जो आंखों से नहीं, आस्था से महसूस होता है।