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'मैं खाकी हूं' पीएम मोदी ने सुनी थी ये कविता, लिखने वाले आईपीएस अफसर वाराणसी में हैं तैनात

Thu, 10 Sep 2020 12:05 PM IST
गीतार्जुन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Thu, 10 Sep 2020 12:05 PM IST
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main khaki hun PM Modi had heard this poem, IPS officer who is writing, is posted in Varanasi
सुकीर्ति माधव मिश्रा, आईपीएस - फोटो : अमर उजाला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में हैदराबाद के सरदार वल्लभ भाई पटेल नेशनल पुलिस एकेडमी से पास होने वाले युवा आईपीएस अफसरों को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए संबोधित किया था। प्रधानमंत्री ने युवा आईपीएस अफसरों से उनके अनुभव के बारे में भी बातचीत की थी।

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उस दौरान मध्य प्रदेश कैडर के आईपीएस आदित्य मिश्रा को प्रधानमंत्री के सामने बोलने का मौका मिला तो उन्होंने अपने साथी कोरोना वॉरियर देवेंद्र चंद्रवंशी को याद करते हुए 'मैं खाकी हूं' कविता सुनाई।
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'मैं खाकी हूं' कविता लिखने वाले 2015 बैच के आईपीएस सुकीर्ति माधव मिश्रा मौजूदा समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में एसपी सुरक्षा के पद पर तैनात हैं। हालांकि, यह कविता इससे पहले भी चर्चा में थी। लेकिन, प्रधानमंत्री के सामने जब से यह सुनाई गई है, तब से सोशल मीडिया पर इसे खूब पसंद और शेयर किया जा रहा है।

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बिहार के जमुई जिले के मलयपुर गांव निवासी सुकीर्ति माधव मिश्रा को भी यह उम्मीद नहीं थी कि उनकी कविता इतनी पसंद की जाएगी और इतनी तारीफ सुनने को मिलेगी। उन्होंने बताया कि यह कविता उन्होंने वर्ष 2017 में ट्रेनिंग के दौरान लिखी थी।

उन दिनों वह मेरठ के कंकरखेरा में तैनात थे। इससे पहले मैं खाकी हूं कविता को नासिक के पुलिस कमिश्नर विश्वास नांगरे पाटिल और बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार भी अपनी आवाज दे चुके हैं।

मैं खाकी हूं।
दिन हूं रात हूं, सांझ वाली बाती हूं, मैं खाकी हूं।
आंधी में, तूफान में, होली में, रमजान में, देश के सम्मान में,
अडिग कर्तव्यों की, अविचल परिपाटी हूं, मैं खाकी हूं।
तैयार हूं मैं हमेशा ही, तेज धूप और बारिश, हंस के सह जाने को, सारे त्योहार सड़कों पे, भीड़ के साथ मनाने को, पत्थर और गोली भी खाने को, मैं बनी एक दूजी माटी हूं, मैं खाकी हूं।
विघ्न विकट सब सह कर भी, सुशोभित सज्जित भाती हूं,
मुस्काती हूं, इठलाती हूं, वर्दी का गौरव पाती हूं, मैं खाकी हूं।
तम में प्रकाश हूं, कठिन वक्त में आस हूं, हर वक्त मैं तुम्हारे पास हूं, बुलाओ, मैं दौड़ी चली आती है, मैं खाकी हूं।
भूख और थकान की वो बात ही क्या, कभी आहत हूं, कभी चोटिल हूं, और कभी तिरंगे में लिपटी, रोती सिसकती छाती हूं, मैं खाकी हूं।
शब्द कह पाया कुछ ही, आत्मकथा में बाकी हूं, मैं खाकी हूं।

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