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कुछ ऐसे थे लालजी टंडन, कर्मचारियों के दुर्व्यवहार से कार्यकर्ता की मौत के बाद लखनऊ से जौनपुर दौड़े चले आए थे

Tue, 21 Jul 2020 02:17 PM IST
गीतार्जुन गौतम अमर उजाला नेटवर्क, जौनपुर
अमर उजाला नेटवर्क, जौनपुर Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Tue, 21 Jul 2020 02:17 PM IST
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Madhya Pradesh Governor lalji tandon died: they come jaunpur from luckdown after bjp worker death due to mistreatment of employees
लालजी टंडन - फोटो : सोशल मीडिया

मध्यप्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन के निधन से हर तरफ शोक की लहर है। प्रदेश सरकार ने तीन दिन के राजकीय शोक का एलान किया है। उनसे लगाव रखने वाले भाजपा कार्यकर्ता मायूस हैं। संगठन और सरकार में विभिन्न पदों पर रहे लालजी टंडन  कार्यकर्ता भावनात्मक रूप से जुड़े थे।

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यही कारण था कि जौनपुर के मड़ियाहूं तहसील में कर्मचारियों के दुर्व्यवहार से एक कार्यकर्ता की मौत की खबर के बाद वह लखनऊ से दौड़े चले आए थे। लखनऊ से जौनपुर की लंबी यात्रा में थकान और कमजोरी से उनकी तबीयत भी बिगड़ गई, बावजूद उन्होंने न सिर्फ आंदोलन में हिस्सा लिया, बल्कि सदन में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।
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यह वाकया वर्ष 2004-05 का है। भाजपा के वरिष्ठ कार्यकर्ता लालता गिरी किसी काम से मड़ियाहूं तहसील गए थे। वहां कर्मचारियों से बहस हो गई। दुर्व्यवहार से आहत लालता गिरी की तहसील में ही हार्ट अटैक से मौत हो गई। इसके बाद गुस्साए भाजपा कार्यकर्ताओं ने जमकर बवाल काटा था। कई दिनों तक आंदोलन भी चला।

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उस समय को याद करते हुए भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष और वरिष्ठ नेता ब्रह्मदेव मिश्र बताते हैं कि लालजी टंडन तब भाजपा की ओर से विधानसभा में नेता सदन थे। उन्हें जब इस घटना की खबर मिली, वह अगले दिन ही जौनपुर आ गए। मड़ियाहूं कस्बे में भगत सिंह तिराहे के पास उस दौरान मंच लगा, वहां पर हजारों कार्यकर्ताओं की भीड़ उमड़ी थी।

सभा को संबोधित करते हुए लालजी टंडन ने प्रशासन और तत्कालीन सपा सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने इस मुद्दे को सदन में उठाने का एलान किया। उनके जोशीले भाषण का असर था कि बाद में प्रशासन को बैकफुट पर आना पड़ा। सभा के बाद जब वह वापस मड़ियाहूं डाक बंगला पहुंचे तो लंबी यात्रा के थकान और कमजोरी के कारण उन्हें चक्कर आने लगा और उनकी तबीयत बिगड़ गई थी।

इसके बावजूद वह पीड़ित परिवार से मिलने उनके घर जाना चाह रहे थे। खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर उन्हें वापस लखनऊ भेजा गया। ब्रह्मदेव मिश्र का कहना है कि लालजी टंडन जुझारू नेताओं में से थे। पहली बार उनका यह तेवर नजदीक से देखने को मिला था।

कार्यकर्ताओं के प्रति उनके मन मे भरपूर सम्मान था। उनके निधन से गहरी क्षति पहुंची है। पूर्व विधायक सुरेंद्र सिंह का कहना है कि लालजी टंडन अभिभावक सरीखे थे। उनके साथ सदन में बैठने का मौका मिला तो काफी कुछ सीखने को मिला। वह हर कार्यकर्ता को पूरा सम्मान और पिता के रूप में मार्गदर्शन देते थे।

उदार व्यक्तित्व और जुझारू तेवरों का ही असर था कि सभासद से लेकर राज्यपाल तक का सफर तय किया। अब ऐसे नेताओं की कमी होती जा रही है।

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