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Varanasi News: प्राण जाए पर वचन न जाई... श्रीराम की चरण पादुकाएं ले नंदीग्राम लौटे भरत

Fri, 09 Oct 2026 01:59 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Fri, 09 Oct 2026 01:59 AM IST
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"Let life be lost, but not one's word..." Bharat returned to Nandigram carrying Shri Ram's sandals.
रामनगर की रामलीला में नंदीग्राम निवास प्रसंग का मंचन करते पात्र। संवाद
रामनगर। रामलीला के चौदहवें दिन बृहस्पतिवार को त्याग, समर्पण और मर्यादा की अनूठी मिसाल देखने को मिली। चित्रकूट प्रसंग के दौरान दोनों भाइयों के अगाध प्रेम और मर्यादा के निर्वहन को देखकर उपस्थित लीला प्रेमी भावविभोर हो उठे। पिता दशरथ के वचनों की लाज रखने और सूर्यवंश की रीति प्राण जाए पर वचन न जाई को निभाते हुए प्रभु श्रीराम ने वनवास के संकल्प को दोहराया, वहीं भ्रातृ प्रेम के प्रतीक भरत जी भी खाली हाथ लौटने को तैयार नहीं थे।
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बारिश के कारण लीला शुरू होने में थोड़ी देर हुई, लेकिन मशालों के जलते ही लीला फिर से शुरू हो गई। मंचन के दौरान जब अयोध्या लौटने को लेकर गहन विमर्श चल रहा था, तब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने भरत को रघुकुल की मर्यादा और वचन पालन के महत्व का बोध कराया। प्रभु ने उन्हें ढांढस बंधाते हुए समझाया कि यह कठिनाई केवल एक निश्चित अवधि तक ही सीमित है। राम के समझाने पर भरत अयोध्या लौटने को राजी तो हुए, किंतु उन्होंने प्रभु से उनकी चरण पादुकाएं (खड़ाऊं) मांग लीं, ताकि उन्हीं को राजसिंहासन पर स्थापित कर राज्य का संचालन किया जा सके।
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प्रस्थान से पहले भरत जी ने चित्रकूट के पवित्र तीर्थ स्थलों के दर्शन और परिक्रमा की इच्छा व्यक्त की। महर्षि अत्रि के परामर्श पर भरत ने प्रभु के राज्याभिषेक हेतु लाए गए समस्त पावन तीर्थों के जल को पर्वत के निकट एक कूप में संरक्षित कर दिया। मुनि ने इस पवित्र जलस्रोत का नाम भरत कूप रखा। इस अवसर पर श्रीराम ने महिमा बताते हुए कहा कि इस कूप के जल के आचमन व सेवन से मानव जाति समस्त रोग-व्याधियों और कष्टों से मुक्त रहेगी।
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चित्रकूट की परिक्रमा पूर्ण होने के पश्चात भरत ने प्रभु से विदा की आज्ञा मांगी। श्रीराम ने सहर्ष अपनी खड़ाऊं भरत को सौंप दी, जिसे शीश पर धारण कर वे अत्यंत भावुक मन से अयोध्या की ओर प्रस्थान कर गए। उधर चित्रकूट में श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण की भव्य आरती संपन्न हुई। अयोध्या लौटने पर भरत जी ने प्रभु की चरण पादुकाओं को पूरे विधि-विधान के साथ राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित किया। इसके उपरांत राजकाज की बागडोर अनुज शत्रुघ्न को सौंपकर वे स्वयं राजसी सुख त्यागकर नंदीग्राम चले गए। वहां पर्णकुटी बनाकर तपस्वी जीवन व्यतीत करते हुए प्रभु की प्रतीक्षा का संकल्प लिया। नंदीग्राम में भरत जी की आरती के साथ ही चौदहवें दिन की पावन लीला को विश्राम दिया गया।
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