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UP: ब्रिटिश चाहते तो रुक सकता था भारत का विभाजन, वाराणसी में प्रो. इश्तियाक अहमद ने कही ये बात
Thu, 04 Apr 2024 12:12 PM IST
प्रगति चंद
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
Published by: प्रगति चंद
Updated Thu, 04 Apr 2024 12:12 PM IST
सार
पाकिस्तानी मूल के स्वीडिश राजनीति शास्त्री प्रो. इश्तियाक अहमद ने कहा कि देश के विभाजन के लिए जिन्ना से अधिक जिम्मेदार ब्रिटिश सरकार है। ब्रिटिश चाहते तो भारत का विभाजन रुक सकता था।
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Ishtiaq Ahmed
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
पाकिस्तानी मूल के स्वीडिश राजनीति शास्त्री प्रो. इश्तियाक अहमद ने कहा कि मोहम्मद अली जिन्ना विभाजन के बाद पूरे पंजाब और बंगाल को पाकिस्तान में चाहते थे लेकिन उनकी ये इच्छा पूरी नहीं हो सकी। जिन्ना पाकिस्तान को कॉमनवेल्थ देशों में रखना चाहते थे इसलिए ब्रिटिश सेना ने भी भारत विभाजन को समर्थन दिया। भारत के विभाजन के लिए जिन्ना से अधिक तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण थी। यदि ब्रिटिश चाहते तो भारत विभाजन रुक सकता था।
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वह बुधवार को बीएचयू के मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र एवं अंतर सांस्कृतिक अध्ययन केंद्र की ओर से आयोजित दो दिवसीय विशिष्ट व्याख्यान शृंखला को संबोधित कर रहे थे। जिन्ना द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत और भारत का विभाजन विषयक व्याख्यान में प्रो. इश्तियाक अहमद ने कहा कि महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से भारत आगमन पर जिन्ना ने उनके स्वागत सभा में स्वागत भाषण पढ़ा था। गांधी जी उससे प्रभावित हुए थे पर आगे चलकर गांधी के विचारों से जिन्ना की सहमति नहीं बन पाई।
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1935 के अधिनियम के बाद से ब्रिटिश राज्य ने कांग्रेस की बढ़ती हुई शक्ति को कम करने के लिए जिन्ना और मुस्लिम लीग की विभाजनकारी नीति और सांप्रदायिक विचारधारा को बढ़ावा दिया। 1930 के बाद से अल्लामा इकबाल और चौधरी रहमत अली ने मुस्लिम बहुल राज्य की आवश्यकता पर जोर दिया जिसे जिन्ना ने द्विराष्ट्रवाद के विचार के रूप में आगे बढ़ाया। आगे चलकर वायसराय लॉर्ड लिनीलिथगो ने यह माना कि भारत में ब्रिटिश सत्ता को बनाए रखने के लिए हमें कांग्रेस को कमजोर करना होगा और जिन्ना को समर्थन देना होगा।
बंटवारे पर आमादा थे जिन्ना, ठुकरा दिया था कांग्रेस का हर प्रस्ताव
प्रो. इश्तियाक अहमद ने कहा कि जिन्ना हिंदुस्तान के बंटवारे पर आमादा थे और उन्होंने कांग्रेस के हर प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। यहां तक कि 1940 में कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद ने उन्हें एक गोपनीय पत्र में सुलह की पेशकश की। लेकिन उन्होंने इसे सार्वजनिक कर दिया। जिन्ना की अंग्रेजों से मिलीभगत के तो दस्तावेजी सबूत हैं। दूसरा विश्व युद्ध शुरू होने पर कांग्रेस अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने पर उतर आई तो जिन्ना उनके समर्थन में खड़े हो गए। उन्हें इस बात का फख्र भी होने लगा था कि अंग्रेज उन्हें सीरियसली ले रहे हैं। उन्होंने कहा भी था कि अभी तक अंग्रेज गांधी-गांधी करते थे। अब वे हमारी तरफ देख रहे हैं। जिन्ना के अलावा मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा ने भी अंग्रेजों का साथ दिया था।
विभाजन के बाद भी भारत ने नहीं की बदले की राजनीति
प्रो. इश्यिताक अहमद ने कहा कि चयनित इतिहास लिखना भ्रमित करना है। भारत में दो समुदायों के बीच नफरत पैदा करके विभाजन हुआ पर आज भी हिंदुस्तान के आम लोगों के दिल में पाकिस्तान और पाकिस्तान के आम लोगों के दिलों में हिंदुस्तान बसता है। विभाजन के समय भारत के नेतृत्व की खूबसूरती ही थी कि उन्होंने बदले की राजनीति ना करके समरस और प्रगतिशील देश बनाने का प्रयास किया।
व्याख्यान के बाद प्रो. इश्तियाक अहमद ने श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर भी दिए। स्वागत केंद्र के समन्वयक प्रो. संजय कुमार ने किया। संचालन डॉ. प्रियंका झा ने किया। इस दौरान प्रो. कमलशील, प्रो. आरके मंडल, प्रो. दीपक मलिक, प्रो. पीसी प्रधान, डॉ. पी दलाई, डॉ. श्रुति रे दलाई आदि मौजूद रहे।
विभाजन के बाद भी भारत ने नहीं की बदले की राजनीति
प्रो. इश्यिताक अहमद ने कहा कि चयनित इतिहास लिखना भ्रमित करना है। भारत में दो समुदायों के बीच नफरत पैदा करके विभाजन हुआ पर आज भी हिंदुस्तान के आम लोगों के दिल में पाकिस्तान और पाकिस्तान के आम लोगों के दिलों में हिंदुस्तान बसता है। विभाजन के समय भारत के नेतृत्व की खूबसूरती ही थी कि उन्होंने बदले की राजनीति ना करके समरस और प्रगतिशील देश बनाने का प्रयास किया।
व्याख्यान के बाद प्रो. इश्तियाक अहमद ने श्रोताओं के प्रश्नों के उत्तर भी दिए। स्वागत केंद्र के समन्वयक प्रो. संजय कुमार ने किया। संचालन डॉ. प्रियंका झा ने किया। इस दौरान प्रो. कमलशील, प्रो. आरके मंडल, प्रो. दीपक मलिक, प्रो. पीसी प्रधान, डॉ. पी दलाई, डॉ. श्रुति रे दलाई आदि मौजूद रहे।