नियमों को ताक पर रखा: वाराणसी में गंगा में नहर खोदाई पर सिंचाई विभाग दोषी, NGT की पीठ बोली- ऐसी गलती पर माफी..
वाराणसी में गंगा पार रेती पर नहर निर्माण में 11.95 करोड़ से ज्यादा की धनराशि खर्च की गई। इस बीच गंगा का जलस्तर बढ़ा और नव निर्मित नहर का अस्तित्व खत्म हो गया। पूरी नहर गंगा की गोद में समा गई। अस्सी से राजघाट के समानांतर नहर की खोदाई पर सिंचाई विभाग को दोषी माना गया है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
वाराणसी में गंगा घाटों पर पानी का दबाव कम करने के दावे के साथ दो साल पहले अस्सी से राजघाट के समानांतर नहर की खोदाई पर सिंचाई विभाग को दोषी माना गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के सख्त रुख को देखते हुए सिंचाई विभाग के अधिकारियों ने अपनी गलती मानी है। एनजीटी के समक्ष कहा है कि जानकारी के अभाव में गलती हुई है।
आदेश के वक्त एनजीटी की पीठ ने दो टूक कहा कि भविष्य में ऐसी गलती पर माफी नहीं मिलेगी। इसके साथ ही नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (एनएमसीजी) को देशभर की नदियों में खोदाई के लिए महीने भर में ड्रेजिंग नियमावली बनाने का आदेश भी दिया गया है।
नहर बनाने में नियमों को ताक पर रख दिया गया
पीठ ने कहा कि बेहद चौंकाने वाली बात है कि गंगा पार रेती पर नहर बनाने में नियमों को ताक पर रख दिया गया। गंगा में ड्रेजिंग से निकले हुए मैटेरियल को टेंडर के जरिये बेचना नियम विरुद्ध है। ड्रेजिंग से निकले हुए बालू का इस्तेमाल सरकारी कार्य, तटबंध बनाने और कटाव रोकने में ही किया जा सकता है। ड्रेजिंग के लिए एनएमसीजी और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से सहमति ली जानी थी, लेकिन वह भी नहीं ली गई।
तीन महीने के अंदर विशेषज्ञों की टीम गठित करने का आदेश
आदेश में कहा गया कि एनएमसीजी देश भर की नदियों में ड्रेजिंग की नियमावली एक माह के अंदर तैयार करे। जो नियमावली बने, उसे एनएमसीजी की वेबसाइट उपलब्ध कराई जाए। इसका विभिन्न माध्यमों से प्रचार भी किया जाए। एनजीटी ने विशेषज्ञों के निर्देश पर सिल्ट निस्तारण की कार्ययोजना तैयार करने के आदेश भी दिए।
ये भी पढ़ें: केंद्र सरकार की अनुमति के बिना वाराणसी में गंगा किनारे बनाई नहर, अब NGT को लेना है फैसला
सिंचाई विभाग के अफसर बोले
गंगा पार नहर खोदाई के मामले में एनजीटी के सख्त रुख से सिंचाई विभाग ने अपनी गलती स्वीकार कर ली और कहा कि उसने जानबूझकर ऐसी गड़बड़ी नहीं की है। सुनवाई के दौरान सिंचाई विभाग के प्रमुख सचिव की तरफ से वकील ने कहा कि हमें तो यह जानकारी ही नहीं थी कि ड्रेजिंग के लिए एनएमसीजी की अनुमति लेनी होगी। हमने यह काम भरोसे में किया था। हमें यह भी नहीं पता था कि ड्रेजिंग मैटेरियल को बेचा नहीं जा सकता है। हमने जानबूझकर गलती नहीं की है। फिलहाल, एनजीटी ने सुनवाई के बाद आदेश देते हुए कहा है कि ऐसी घटना दोबारा नहीं होनी चाहिए।
गंगा पार रेती पर अवैध खनन भी हुआ
याचिकाकर्ता की तरफ से वकील सौरभ तिवारी ने तर्क दिया कि गंगा पार रेती पर अवैध खनन किया गया था और बाढ़ में वह बह भी गया। इसके बाद भी खोदाई की गई और उसे बेचा गया। इसके लिए एनएमसीजी की ओर से कोई अनुमति नहीं ली गई।
नहीं मानी थी विशेषज्ञों की सलाह
गंगा पार रेती पर जब नहर बनवाने का फैसला हुआ तो नदी वैज्ञानिक प्रो. यूके चौधरी, प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र व प्रो बीडी त्रिपाठी ने सवाल उठाए और कहा था कि जलस्तर बढ़ने के साथ ही नहर का अस्तित्व खत्म हो जाएगा। करोड़ों रुपये बेकार हो जाएंगे। जैसे ही नदी का जलस्तर बढ़ा, वैसे ही नहर का अस्तित्व खत्म हो गया। अगर वैज्ञानिकों की सलाह मानते तो बड़े नुकसान से बचा जा सकता था।
ये भी पढ़ें: बस में भी 'मील ऑन व्हील' का लें आनंद: गाड़ी में बैठ करें ऑर्डर, अगले स्टॉपेज पर मिलेगा खाना
11.95 करोड़ से ज्यादा हुए खर्च
सिंचाई विभाग ने तीन फरवरी 2021 को अस्सी व राजघाट पर पानी का दबाव कम करने के लिए जेसीबी व पोकलैंड के जरिये नहर का निर्माण कराया था इसमें ड्रेजिंग का सहारा लिया गया और 5.3 किलोमीटर लंबी नहर बना दी गई। नहर निर्माण पर 11.95 करोड़ से ज्यादा की धनराशि खर्च की गई। इस बीच गंगा का जलस्तर बढ़ा और नवनिर्मित नहर का अस्तित्व खत्म हो गया। पूरी नहर गंगा की गोद में समा गई। इससे विवाद बढ़ा और मामला एनजीटी तक पहुंच गया। केंद्रीय जलशक्ति मंत्रालय ने पांच जनवरी 2023 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के समक्ष जो जवाब दाखिल किया था, उसमें साफ कहा था कि नमामि गंगे और राज्य पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण से गंगा पार रेती पर नहर खोदाई की अनुमति नहीं ली गई थी।