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अंतराष्ट्रीय विधवा दिवस: पति खोया पर बच्चों के लिए खुद को किया मजबूत, पढ़ें वाराणसी के इन महिलाओं की संघर्ष की कहानी

Wed, 23 Jun 2021 04:54 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Wed, 23 Jun 2021 04:54 PM IST
सार

अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस पर हम ऐसी ही महिलाओं से रूबरू होंगे जिन्होंने मुश्किल आने पर इन महिलाओं ने आंसू नहीं बहाए, बल्कि उन आंसुओं को अपनी ताकत बनाकर अपनी शक्ति को समेटा और परिवार को नए सिरे से जिंदगी की पटरी पर ले निकलीं। 

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international Widow Day Lost husband but strengthened himself for childs read the story of struggle of these women of Varanasi
अपने बेटे के साथ इंदु - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 यकीन हो तो कोई रास्ता निकलता है, हवा की ओट भी लेकर चराग जलता है।... मंजूर हाशमी का यह शेर जिदंगी को जिंदादिली के साथ जीने की प्रेरणा देता है। इसी जिंदादिली के साथ कई महिलाएं पति के जाने के बाद हिम्मत की पिटारी बांधकर आगे बढ़ चली हैं। अंतरराष्ट्रीय विधवा दिवस पर हम ऐसी ही महिलाओं से रूबरू होंगे जिन्होंने मुश्किल आने पर इन महिलाओं ने आंसू नहीं बहाए, बल्कि उन आंसुओं को अपनी ताकत बनाकर अपनी शक्ति को समेटा और परिवार को नए सिरे से जिंदगी की पटरी पर ले निकलीं। 
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नौकरी कर बेटे को बनाया काबिल
मंडलीय अस्पताल में फार्मास्टि रहे जयनाथ दुबे के मृत्यु 1994 में जब हुई तो उनकी पत्नी इंदु को लगा जैसे उनकी दुनिया ही खत्म हो गई हो। लेकिन जब बेटे का चेहरा देखा तो इंदु ने संघर्षों भरा रास्ता चुना। कई नौकरी ढूंढने और दफ्तरों में चक्कर लगाने के बाद उन्हें किसी तरह सीएमओ कार्यालय में कनिष्ठ लिपिक के पद पर नौकरी मिली।
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इंदु के सामने अपने इकलौते बेटे को अच्छी परवरिश देने की समस्या थी। लेकिन इंदु ने नौकरी के साथ इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया। आज मां के संघर्षों ने उन्हें काबिल इंसान बना दिया है। वर्तमान में इंदु के बेटे उत्तर प्रदेश उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के अंतर्गत हिंदी विषय में असिस्टेंट प्रोफेसर है।
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मैं हार जाती तो बच्चों का क्या होता

कोरोना काल में पंचायत ड्यूटी में पीठासीन अधिकारी सुनील चुक्रवाल कोरोना के कारण काल के गाल में समा गए। लेकिन वो अपने पीछे पत्नी के साथ एक बेटे और बेटी को बेसहारा छोड़ गए। सुनील के जाने के बाद रंजना के सामने आजीविका चलाने की सबसे बड़ी समस्या खड़ी हो चुकी थी। रंजना कहती है कोरोना ने मेरे पति को तो मुझसे छीन लिया, लेकिन मैं हार जाऊंगी तो मेरे बच्चों को क्या होगा। मैंने अपने आंसुओं को अपनी ताकत बना लिया है। 18 जून को मुख्यमंत्री से नियुक्ति पत्र मिलने के बाद थोड़ी हिम्मत बढ़ी है कि अब बच्चों को एक बेहतर भविष्य दे पाऊंगी। 
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