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International Dance Day: 'स्वस्थ्य रहने का माध्यम भी है डांस', काशी के डांसर बोले- हमारी धरोहर है भारतीय नृत्य

Tue, 29 Apr 2025 01:27 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Tue, 29 Apr 2025 01:27 AM IST
सार

इंटरनेशनल डांस डे के अवसर पर काशी के विभिन्न स्थानों पर आयोजन हो रहे हैं। इसमें यहां के कलाकार भारतीय नृत्य को आगे बढ़ाने की अपील किए। उन्होंने कहा कि नृत्य भारतीय धरोहर है, जिसे और आगे ले जाने की जरूरत है।

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International Dance Day means of staying healthy dancers from Kashi said Indian dance is our heritage
कृष्णा रॉय चौधरी, आशीष सिंह, डॉ. अलका गिरी और उर्वशी श्रीवास्तव। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

International Dance Day: एक जमाना था जब भारतीय नृत्य की पहुंच विदेशों तक थी, लेकिन आज इसमें कमी आई है। कोई भी कलाकार बहुत कम ही भारत के बाहर जाकर डांस के फन को दिखा पाता है। उक्त बातें काशी में डांस सिखाने वाले कलाकारों ने व्यक्त किए। इंटरनेशनल डांस डे को लेकर उन लोगों ने अपने-अपने विचार रखें।

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वाराणसी की कथक नृत्यांगना कृष्णा रॉय चौधरी ने कहा कि डांस हमारी भावनाओं को दर्शाने की अनोखी कला है। डाॅ. जया राॅय से कथक की तालीम लेने वालीं कृष्णा शास्त्रीय नृत्य की कला को आगे बढ़ा रही हैं। वह बताती हैं कि नृत्य और संगीत, धैर्य एवं उत्साह के साथ स्वस्थ रहने की कला सिखाता है। जबकि इंडियन डांस को कभी-कभी हेय दृष्टि से देखा जाता है, जो गलत है।
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वह बताती हैं कि यह सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह संघर्षों से लड़ने की भी ताकत देता है। जरूरत है इसे आत्मसात करने की। आने वाली पीढ़ी को भी यह स्वस्थ रख सकता है। वर्तमान में समाज को एक मजबूत मंच की जरूरत है, जहां हर उम्र के लोग डांस को सीख और देख सकें। डांस से समृदि्ध और एकता का भी माहाैल बनता है।

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युवाओं को आगे आने की जरूरत

युवा कथक नर्तक आशीष सिंह नृत्य मंजरी दास ने कहा कि काशी से तालीम लेने के बाद भारतीय नृत्य को देश-दुनिया में पहुंचाना ही मेरा सपना है। आज विश्व नृत्य दिवस पर भी मेरा यही संदेश है कि कथक भारतीय धरोहर है, इसे बचाने की जरूरत है। इसके लिए गुरुओं के साथ शिष्यों को भी तन-मन से आगे आने की जरूरत है।

आशीष ने कहा कि आज बच्चों के माध्यम से ही कभी-कभी पाश्चात्य नृत्य पेश करवाएं जा रहे हैं। जबकि भारतीय नृत्य की कलाओं को खत्म करने की कोशिश की जा रही है। अभिभावकों को भी चाहिए कि बच्चों को भारतीय नृत्य के बार में बताएं, उन्हें सिखाएं। उन्होंने कहा कि भारतीय नृत्य के लिए हम सभी को एकजुट होने की जरूरत है, यही हमारी संस्कृति है।

भरत नाट्यम नृत्य करने वाली काशी की डॉ. अलका गिरी नृत्य एक साधना की तरह देखती हैं। वह बताती हैं कि यह अमूल्य धरोह है, जिसे बढ़ाने का कार्य प्रत्येक कलाकार को करनी चाहिए। युवा पीढ़ी अच्छा तो कर रही है लेकिन कहीं न कहीं कुछ कमी है। इसे समझाने और सुधारने की जरूरत है।

उन्होंने कहा कि एक जमाना था, जब डांस में लोग अपना कॅरियर देखते थे। आज इसमें संघर्ष देखा जा रहा है। फ्यूजन डांस को एडाप्ट किया जा रहा है। शास्त्रीय नृत्य और इसकी कलाओं को एक मंच मिलना चाहिए। तभी हमारी पीढ़ी इसे आत्मसात करेगी और यह अनोखी कला आगे बढ़ेगी।

महिलाओं का बढ़ रहा सम्मान

वाराणसी की कथक नृत्यांगना उर्वशी श्रीवास्तव अपनी मां को ही अपना गुरु मानतीं हैं, जो पंडित बिरजू महाराज की शिष्या रहीं हैं। वे मुंबई में रहकर इस भारतीय कला को आगे बढ़ा रही हैं। बनारस आते ही वे चहक उठती हैं। वे बताती हैं कि आज की पीढ़ी को गुरुओं से तन-मन से सीखने की जरूरत है। 

वे कहती हैं कि पहले भी लोग इस कला में महिलाओं को आगे बढ़ाते थे, आज भी यही व्यवस्था है। लड़कियों को खुद आगे बढ़कर इस भारतीय कला को आत्मसात करने और इसे आगे बढ़ाने की इच्छा होनी चाहिए।

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