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अंतरराष्ट्रीय बाल पुस्तक दिवस आज
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बाल साहित्य की परंपरा बहुत समृद्ध है और आज भी उसका सृजन प्रवाहमान है। समय के साथ पुस्तकों की दुनिया में बहुत बदलाव आया है। डिजिटल दुनिया ने पुस्तकों को हर तबके से दूर किया है खासकर बच्चों से। धर्म, कला, संस्कृति और साहित्य की नगरी काशी ने भी बाल साहित्य का संसार रचा है और आज की नई पीढ़ी उस परंपरा को अनवरत बनाए हुए हैं।
बाल साहित्यकार पवन कुमार वर्मा का कहना है कि बाल साहित्य बहुत समृद्ध है। वर्तमान में बाल साहित्य का स्वर्णिम काल है लेकिन यह अपने पाठकों तक नहीं पहुंच पा रहा है। हमारे पाठक छोटे बच्चे हैं जो किताबें खुद से नहीं खरीद सकते हैं। यह जिम्मेदारी माता-पिता और स्कूलों की है जो बच्चों तक बाल साहित्य पहुंचाएं। हम इसके लिए बच्चों को दोष नहीं दे सकते हैं क्योंकि वह तो मिट्टी के पुतले हैं और हम जैसे उनको गढ़ेंगे वह वैसे ही बनेंगे। प्रेमचंद की ईदगाह सर्वकालिक बाल साहित्य की श्रेणी में आज भी गिनी जाती है। उस कहानी में जो संवेदना है आज भी हर मन को छू जाती है लेकिन वर्तमान में संवेदनाएं समाप्त हो रही हैं। संस्मरण खूब लिखे जा रहे हैं लेकिन कमी बस वही है कि यह हमारे मूल पाठकों तक कैसे पहुंचे। यह बस लेखकों के बीच ही घूम रहा है और पाठकों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
महाकवि पुष्कर ने की बाल साहित्य की शुरुआत
नवगीतकार व बाल साहित्यकार सुरेंद्र वाजपेयी ने बताया कि बाल साहित्य का सृजन आसान नहीं है। जितने भी बड़े साहित्यकार हुए सभी ने बाल साहित्य की रचना की। बनारस में बाल साहित्य की शुरुआत काशी नरेश के दरबारी कवि महाकवि पुष्कर ने की थी। उन्होंने बाल साहित्य को समृद्ध किया और बाल साहित्य की रचना की। उनके जाने के बाद बाल साहित्य में खास सृजन नहीं हुआ लेकिन इसके बाद डॉ. श्रीप्रसाद ने बाल साहित्य का उत्थान किया और उनकी कहानियों का विदेशों में भी अनुवाद हुआ। उनके साथ श्यामलाकांत वर्मा ने भी बाल साहित्य के सृजन में महत्वपूर्ण योगदान किया। वहीं भइया जी बनारसी ने भी बाल साहित्य की रचनाएं कीं।
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बाल साहित्य की पुस्तकें
सपनों की दुनिया, मिठ्ठू चाचा, हम सब साथ हैं, मटके वाली कुलफी, जंगल की एकता, अनोखी दोस्ती, अर्जुन और उसका गांव, मेरी बड़ी किताब
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बाल साहित्यकार पवन कुमार वर्मा का कहना है कि बाल साहित्य बहुत समृद्ध है। वर्तमान में बाल साहित्य का स्वर्णिम काल है लेकिन यह अपने पाठकों तक नहीं पहुंच पा रहा है। हमारे पाठक छोटे बच्चे हैं जो किताबें खुद से नहीं खरीद सकते हैं। यह जिम्मेदारी माता-पिता और स्कूलों की है जो बच्चों तक बाल साहित्य पहुंचाएं। हम इसके लिए बच्चों को दोष नहीं दे सकते हैं क्योंकि वह तो मिट्टी के पुतले हैं और हम जैसे उनको गढ़ेंगे वह वैसे ही बनेंगे। प्रेमचंद की ईदगाह सर्वकालिक बाल साहित्य की श्रेणी में आज भी गिनी जाती है। उस कहानी में जो संवेदना है आज भी हर मन को छू जाती है लेकिन वर्तमान में संवेदनाएं समाप्त हो रही हैं। संस्मरण खूब लिखे जा रहे हैं लेकिन कमी बस वही है कि यह हमारे मूल पाठकों तक कैसे पहुंचे। यह बस लेखकों के बीच ही घूम रहा है और पाठकों तक नहीं पहुंच पा रहा है।
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महाकवि पुष्कर ने की बाल साहित्य की शुरुआत
नवगीतकार व बाल साहित्यकार सुरेंद्र वाजपेयी ने बताया कि बाल साहित्य का सृजन आसान नहीं है। जितने भी बड़े साहित्यकार हुए सभी ने बाल साहित्य की रचना की। बनारस में बाल साहित्य की शुरुआत काशी नरेश के दरबारी कवि महाकवि पुष्कर ने की थी। उन्होंने बाल साहित्य को समृद्ध किया और बाल साहित्य की रचना की। उनके जाने के बाद बाल साहित्य में खास सृजन नहीं हुआ लेकिन इसके बाद डॉ. श्रीप्रसाद ने बाल साहित्य का उत्थान किया और उनकी कहानियों का विदेशों में भी अनुवाद हुआ। उनके साथ श्यामलाकांत वर्मा ने भी बाल साहित्य के सृजन में महत्वपूर्ण योगदान किया। वहीं भइया जी बनारसी ने भी बाल साहित्य की रचनाएं कीं।
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