यूपी के इस शहर में कुछ यूं प्रदूषित हो रहीं मां गंगा, हर साल प्रवाहित की जा रही चार सौ टन राख
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‘मुक्ति के घाट मणिकर्णिका पर काशीपुराधिपति तारक मंत्र देते हैं’ आस्थावानों की यह मान्यता मोक्ष की लालसा के रूप में मोक्षदायिनी को प्रदूषित कर रही है। करीब चार साल पहले किए गए सर्वेक्षण के अनुसार, मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट पर हर साल करीब 33 हजार शवों का दाह संस्कार होता है और इनसे निकली करीब चार सौ टन राख गंगा में प्रवाहित की जाती है।
सर्वे के अनुसार, अधजले शव भी गंगा में बहाए जाते हैं। इनकी मात्रा करीब दो सौ से ढाई सौ टन होती है। लोग दाह संस्कार में प्रयोग किए जाने वाले कपड़े और बांस आदि भी घाट पर छोड़कर चले जाते हैं, इन्हें भी गंगा में बहा दिया जाता है। इसके अलावा ऐसे शव जिनका दाह संस्कार नहीं होता है, वह भी गंगा में प्रवाहित कर दिए जाते हैं। मृत पशु भी गंगा में फेंक दिए जाते हैं।
बीएचयू के नदी विज्ञानी प्रो. बीडी त्रिपाठी का कहना है कि प्रदूषण के कारण गंगा में ऐसे बैक्टीरिया और जीवाणुओं की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है तो बीमारियां फैलाते हैं। घुलित ऑक्सीजन की मात्रा भी लगातार घट रही है। हालांकि हरिश्चंद्र घाट पर शवदाह गृह में गैस से शवदाह होने, लोगों में जागरूकता और शासन की सख्ती के चलते गंगा में राख प्रवाहित करने और अधजले शवों को फेंके जाने के मामलों में कमी आई है।
16 हजार टन जलाई जाती है लकड़ी
सर्वे के अनुसार, शवदाह के लिए एक साल में करीब 16 हजार टन लकड़ी जलाई जाती है। इससे 77 किग्रा नाइट्रोजन, 48 हजार किग्रा फ ास्फ ोरस और पांच हजार किलोग्राम पोटैशियम पानी में घुल जाता है। इससे बीओडी (बॉयोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड) तेजी से बढ़ रही है। नदी विज्ञानी प्रो. यूके चौधरी कहते हैं कि गंगा में लाश व अधजले शवों को फेंका जाना बेहद खतरनाक साबित हो रहा है।
हो सकती हैं बीमारियां
नदी विज्ञानी प्रो. बीडी त्रिपाठी के मुताबिक, गंगा में राख के अलावा अधजले शवों व लाशों के फेंके जाने से स्नान करने वालों को चर्म रोग, पीलिया, कैंसर, डायरिया और हैजा जैसी बीमारियां हो सकती हैं।
बचाव के तरीके
- राजघाट पर नया विद्युत शवदाह गृह बनाया जाए।
- हरिश्चंद्र घाट पर गैस शवदाह गृह में शवों का निस्तारण कराने के लिए प्रचार-प्रसार किया जाए।
- पशुओं के लिए शहर से बाहर विद्युत शवदाह गृह बनाया जाएं।
- शव व अधजले शव फेंके जाने पर प्रतिबंध का कड़ाई से पालन कराया जाए।
- मृत पशुओं को गंगा में बहाने अथवा नहलाने पर रोक लगाई जाए।
- लावारिस शवों को शवदाह गृह में जलाने के बजाय गंगा में फेंकने कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
मणिकर्णिका घाट से हुई थी काशी की उत्पत्ति
पौराणिक मान्यता के अनुसार, विश्व का प्रथम कुंड चक्रपुष्करिणी तीर्थ भी मणिकर्णिका घाट पर है। काशी की उत्पत्ति भी इसी घाट से हुई थी। यह कुंड गंगा अवतरण के पहले से है।मान्यता है कि भगवान शिव और शक्ति ने इसी कुं ड में स्नान किया था।शिव और शक्ति द्रवीभूत स्वरूप में इस कुंड में विराजमान रहते हैं। गंगा के जलस्तर में गिरावट के कारण कुंड सूखने के कगार पर है। यही नहीं, इसी घाट पर जगद्गुरु शंकराचार्य का भगवान शिव के साथ शास्त्रार्थ हुआ था और रामकृष्ण परमहंस को शिव का प्रथम दर्शन भी यहीं हुआ था।
मणिकर्णिका व हरिश्चंद्र घाट का सर्वेक्षण
- जलाई जाने वाली लाशें 33000 प्रतिवर्ष
- जलाई जाने वाली लकड़ी 16 हजार टन प्रति वर्ष
- लकड़ियों से निकलने वाली राख 400 टन प्रति वर्ष
- अधजली लाशें 250 टन प्रतिवर्ष
- बगैर जलाई फेंकी जाने वाली लाशें- 2950 प्रति वर्ष
- मृत पशुओं का गंगा में प्रवाह 5270 प्रति वर्ष