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प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र के इस छोटे से गांव में हैं 100 से ज्यादा दिव्यांग
amarujala.com, presented by कृष्ण कुमार गुप्ता
Updated Sun, 03 Dec 2017 04:32 PM IST
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पूरे गांव में दिव्यांगजन
- फोटो : अमर उजाला
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पीएम नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में एक ऐसा गांव भी है जहां 100 से अधिक लोग दिव्यांग हैं। इस गांव की आबदी मात्र पांच हजार है। यहां पर बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक दिव्यांग मिलेंगे। जिले के सेवापुरी ब्लॉक के ग्रामसभा पूरे में कई बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक दिव्यांग हैं।
करीब छह साल पहले एक टीम गांव में जाकर जांच की थी। इसके बाद कोई प्रशासनिक या स्वास्थ्य टीम यहां नहीं आई। कई परिवार ऐसे हैं जिसमें सभी दिव्यांग हैं। किसी तरह यहां लोगों की जिंदगी खिसक रही है। पूरे गांव की अजीब स्थिति है।
यहां बच्चे जन्म के समय तो ठीक रहते हैं लेकिन आगे ठीक रहेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। विकलांगों की हालत यह है कि अधिकांश तो काम करने लायक नहीं है। दिव्यांग होने का प्रमुख कारण क्या हैं, इस बारे में किसी को पता नहीं चल पा रहा है। यहां तक कि चिकित्सक भी इससे अनभिज्ञ हैं।
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63 लोग तो ऐसे हैं जिन्हें दिव्यांग पेंशन मिलती है जबकि एक दर्जन से अधिक लोगों के पास प्रमाणपत्र न होने से वे पेंशन के हकदार नहीं माने जा रहे। इसी गांव के दिव्यांग कमला शंकर पटेल (58) का कहना है कि हमारे क्षेत्र से माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी सांसद हैं हम लोगो को काफी उम्मीद है कि वे जरूर कुछ करेंगे।
गांव की आबादी करीब 6 हजार है। करीब 34 सौ मतदाता हैं। मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे से सटा पूरे गांव की ओर शायद शासन प्रशासन की नजर नहीं पड़ी।
सीएमओ डॉ. वीबी सिंह का कहना है कि गांव में दिव्यांग लोगों की हर संभव सहायता की जाएगी। इसके लिए खुद विभागीय अधिकारियों के साथ जल्द ही गांव जाकर ग्राम प्रधान सहित लोगों से बात की जाएगी। जरूरत पड़ने पर जांच शिविर लगाकर लोगों की जांच भी कराई जाएगी।
ग्राम प्रधान सुभाष मौर्य के अनुसार दिव्यांगों को बुनियादी सुविधाएं दिलाने का प्रयास किया जा रहा है। गांव में लोग कैसे इसकी चपेट में आ रहे हैं अधिकारियों से कहकर इसकी जांच कराई जाएगी।
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करीब छह साल पहले एक टीम गांव में जाकर जांच की थी। इसके बाद कोई प्रशासनिक या स्वास्थ्य टीम यहां नहीं आई। कई परिवार ऐसे हैं जिसमें सभी दिव्यांग हैं। किसी तरह यहां लोगों की जिंदगी खिसक रही है। पूरे गांव की अजीब स्थिति है।
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यहां बच्चे जन्म के समय तो ठीक रहते हैं लेकिन आगे ठीक रहेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है। विकलांगों की हालत यह है कि अधिकांश तो काम करने लायक नहीं है। दिव्यांग होने का प्रमुख कारण क्या हैं, इस बारे में किसी को पता नहीं चल पा रहा है। यहां तक कि चिकित्सक भी इससे अनभिज्ञ हैं।
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63 लोग तो ऐसे हैं जिन्हें दिव्यांग पेंशन मिलती है जबकि एक दर्जन से अधिक लोगों के पास प्रमाणपत्र न होने से वे पेंशन के हकदार नहीं माने जा रहे। इसी गांव के दिव्यांग कमला शंकर पटेल (58) का कहना है कि हमारे क्षेत्र से माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी सांसद हैं हम लोगो को काफी उम्मीद है कि वे जरूर कुछ करेंगे।
गांव की आबादी करीब 6 हजार है। करीब 34 सौ मतदाता हैं। मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर नेशनल हाईवे से सटा पूरे गांव की ओर शायद शासन प्रशासन की नजर नहीं पड़ी।
सीएमओ डॉ. वीबी सिंह का कहना है कि गांव में दिव्यांग लोगों की हर संभव सहायता की जाएगी। इसके लिए खुद विभागीय अधिकारियों के साथ जल्द ही गांव जाकर ग्राम प्रधान सहित लोगों से बात की जाएगी। जरूरत पड़ने पर जांच शिविर लगाकर लोगों की जांच भी कराई जाएगी।
ग्राम प्रधान सुभाष मौर्य के अनुसार दिव्यांगों को बुनियादी सुविधाएं दिलाने का प्रयास किया जा रहा है। गांव में लोग कैसे इसकी चपेट में आ रहे हैं अधिकारियों से कहकर इसकी जांच कराई जाएगी।
एक नजर इन पर
दिव्यांग कैलाश पटेल
- फोटो : अमर उजाला
केस-1
राम बली पटेल के पांच बच्चे थे। जिसमें चार बच्चे जवान होने के बाद विकलांग होकर मर चुके हैं। अब एक बच्ची है वह भी विकलांग है। इनका कहना है कि सभी बच्चे ठीक पैदा हुए थे। करीब दस से बारह साल होने के बाद विकलांग का असर दिखने लगा। इलाज का भी कोई असर नहीं हुआ।
केस-दो
कैलाश के दोनों बच्चे विकलांग हैं। इनकी पत्नी पहले ठीक थी लेकिन दोनों बच्चे पैदा होने के बाद विकलांगता का असर शुरू हो गया। अब विकलांगता का दंश झेल रही है। कैलाश का कहना है कि ऐसे में परिवार का पालन-पोषण करना मुश्किल हो गया है। परिवार में काम करने वाले अकेले हैं। जबकि खर्च दिनोंदिन बढ़ रहा है।
केस-3
रज्जू राम (62) साल सबसे अधिक उम्र वाले दिव्यांग है। करीब 20 साल के रहे होंगे, तभी शरीर में कमजोरी महसूस होने लगी। इलाज के बावजूद शरीर कमजोर होता गया। अब काम करने लायक नहीं हूं।
राम बली पटेल के पांच बच्चे थे। जिसमें चार बच्चे जवान होने के बाद विकलांग होकर मर चुके हैं। अब एक बच्ची है वह भी विकलांग है। इनका कहना है कि सभी बच्चे ठीक पैदा हुए थे। करीब दस से बारह साल होने के बाद विकलांग का असर दिखने लगा। इलाज का भी कोई असर नहीं हुआ।
केस-दो
कैलाश के दोनों बच्चे विकलांग हैं। इनकी पत्नी पहले ठीक थी लेकिन दोनों बच्चे पैदा होने के बाद विकलांगता का असर शुरू हो गया। अब विकलांगता का दंश झेल रही है। कैलाश का कहना है कि ऐसे में परिवार का पालन-पोषण करना मुश्किल हो गया है। परिवार में काम करने वाले अकेले हैं। जबकि खर्च दिनोंदिन बढ़ रहा है।
केस-3
रज्जू राम (62) साल सबसे अधिक उम्र वाले दिव्यांग है। करीब 20 साल के रहे होंगे, तभी शरीर में कमजोरी महसूस होने लगी। इलाज के बावजूद शरीर कमजोर होता गया। अब काम करने लायक नहीं हूं।