{"_id":"699f6289ae6946930d070dc1","slug":"holi-of-the-crematorium-will-be-celebrated-on-harishchandra-on-rangbhari-ekadashi-and-on-manikarnika-on-28th-varanasi-news-c-20-vns1056-1303268-2026-02-26","type":"story","status":"publish","title_hn":"Varanasi News: रंगभरी एकादशी पर हरिश्चंद्र और 28 को मणिकर्णिका पर होगी मसाने की होली","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Varanasi News: रंगभरी एकादशी पर हरिश्चंद्र और 28 को मणिकर्णिका पर होगी मसाने की होली
विज्ञापन
मणिकर्णिका घाट पर मशाने की होली की जानकारी देते कार्यवाहक अध्यक्ष पुनीत पागल । अमर उजाला
अघोर पीठ के पीठाधीश्वर औघड़ कपाली बाबा ने कहा कि काशी की धार्मिक परंपराओं में मसाने की होली है। इसके बिना कोई सनातनी होली नहीं मनाता है। होलिका दहन के बाद ही हम होली मनाते हैं। होलिका की चिता से ही तो हम होली की शुरुआत करते हैं। जबकि अघोर परंपरा के अनुयायी भगवान शिव के उपासक होते हैं और वह चिता भस्म के साथ होली खेलते हैं। इसलिए इसे परंपरा से अलग नहीं कर सकते हैं। इस बार भी चिता भस्त की होली होगी। 27 फरवरी को हरिश्चंद्र घाट और 28 फरवरी को मणिकर्णिका घाट पर परंपरागत ढंग से मसाने की होली खेली जाएगी। इसको लेकर प्रशासन से वार्ता हुई है। व्यवस्थित तरीके से आयोजन होगा।
हरश्चिंद्र घाट पर बुधवार को कपाली बाबा और मणिकर्णिका घाट पर चिता भस्म की होली के आयोजक गुलशन कपूर ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि मसाने की होली को विरोध की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। हर किसी को अपने मत देने का हक है। श्रीकाशी विद्वत परिषद के मत का हम खंडन नहीं कर सकते हैं। मगर, यह कहना कि मसाने की होली की परंपरा नहीं है। मथुरा में लट्ठमार, ब्रज में लड्डू से होली खेली जाती है। ऐसे ही काशी में मसाने की होली खेली जाती है। अब इसका स्वरूप विराट हुआ है तो इसे सिरे से खारिज कर देना कि यह होता ही नहीं है, गलत है। कपाली बाबा ने कहा कि बिना होलिका के होली हो ही नहीं सकती है। अघोर परंपरा के लोग शिव के उपासक हैं। उनके लिए मसाने की होली खास होती है। दोनों घाटों पर पालकी यात्रा निकाली जाएगी। दोपहर में बाबा मसाननाथ के अभिषेक और आरती के बाद भस्म की होली होगी।
350 वर्षों पहले शैव संन्यासियों ने की थी शुरू
कपाली बाबा ने बताया कि प्राप्त पारंपरिक साक्ष्यों के अनुसार, मसाने की होली संगठित एवं उत्सवी स्वरूप में करीब 350 वर्षों पूर्व बाबा कालभैरव के तत्कालीन पीठाधिपति अघोरी उमानाथ, बाबा कीनाराम महाराज के प्रधान शिष्य बाबा बीजाराम और नाथ परंपरा के प्रसिद्ध संत योगी दीनानाथ के संयोजन में मसाने की होली शुरू हुई थी। इनका उल्लेख परंपरागत प्रपत्रों एवं स्थानीय इतिहासकारों के अभिलेखों से प्राप्त होता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
हरश्चिंद्र घाट पर बुधवार को कपाली बाबा और मणिकर्णिका घाट पर चिता भस्म की होली के आयोजक गुलशन कपूर ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि मसाने की होली को विरोध की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। हर किसी को अपने मत देने का हक है। श्रीकाशी विद्वत परिषद के मत का हम खंडन नहीं कर सकते हैं। मगर, यह कहना कि मसाने की होली की परंपरा नहीं है। मथुरा में लट्ठमार, ब्रज में लड्डू से होली खेली जाती है। ऐसे ही काशी में मसाने की होली खेली जाती है। अब इसका स्वरूप विराट हुआ है तो इसे सिरे से खारिज कर देना कि यह होता ही नहीं है, गलत है। कपाली बाबा ने कहा कि बिना होलिका के होली हो ही नहीं सकती है। अघोर परंपरा के लोग शिव के उपासक हैं। उनके लिए मसाने की होली खास होती है। दोनों घाटों पर पालकी यात्रा निकाली जाएगी। दोपहर में बाबा मसाननाथ के अभिषेक और आरती के बाद भस्म की होली होगी।
विज्ञापन
350 वर्षों पहले शैव संन्यासियों ने की थी शुरू
कपाली बाबा ने बताया कि प्राप्त पारंपरिक साक्ष्यों के अनुसार, मसाने की होली संगठित एवं उत्सवी स्वरूप में करीब 350 वर्षों पूर्व बाबा कालभैरव के तत्कालीन पीठाधिपति अघोरी उमानाथ, बाबा कीनाराम महाराज के प्रधान शिष्य बाबा बीजाराम और नाथ परंपरा के प्रसिद्ध संत योगी दीनानाथ के संयोजन में मसाने की होली शुरू हुई थी। इनका उल्लेख परंपरागत प्रपत्रों एवं स्थानीय इतिहासकारों के अभिलेखों से प्राप्त होता है।
विज्ञापन