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महिलाओं के हक की हुई पहली जीत
टीम डिजिटल / अमर उजाला, वाराणसी
Updated Thu, 08 Dec 2016 08:37 PM IST
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तीन तलाक के विरोध में मुस्लिम महिलाओं की लगी कचहरी।
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तीन तलाक पर हाईकोर्ट के फैसले से जहां महिलाएं खुश हैं, वहीं आलिमों ने इसकी मुखालफत की है। महिलाओं का कहना है कि ये उनके हक की लड़ाई की पहली जीत है। उधर उलेमा का कहना है कि वो कोर्ट के फैसले का अपमान नहीं करते लेकिन ये जरूर है कि ये फैसला इस्लामी कानून के खिलाफ है।
मुस्लिम पर्सनल लॉ कुरान और हदीस की रौशनी में भी बनाए गए हैं और उसमें तीन तलाक का जिक्र है। गुरुवार को आए हाईकोर्ट के फैसले की सराहना करते हुए वसंत कन्या महाविद्यालय की डॉ. नुजहत फातमा का कहना है कि तलाक सबसे बदतरीन चीज है। तीन तलाक बिलकुल भी जायज नहीं। जब निकाह गवाहों के बीच होता है तो तलाक भी गवाहों के बीच होना चाहिए। कोर्ट का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए।
मुस्लिम महिला फाउंडेशन की अध्यक्ष नाजनीन अंसारी का कहना है कि ये महिलाओं के हक की पहली जीत है। अल्लाह को सबसे ज्यादा नापसंद कुछ है तो वो है तलाक। गुस्से में तलाक देकर मर्द गुनाह करते हैं लेकिन उस गुनाह की सजा महिला व उसके बच्चे भुगतते हैं।
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उधर मुफ्ती-ए-शहर मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी का कहना है कि कोर्ट के फैसला का पूरा सम्मान है लेकिन ये फैसला पूरी तरह से इस्लामी कानून के खिलाफ है। ये मुस्लिम पर्सनल लॉ के खिलाफ है। इसके लिए मुसलमान सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।
उधर जमीअत-उल-उलेमा जिला बनारस के अब्दुल्ला फैसल कहते हैं कोर्ट का ये फैसला चौंकाने वाला है। हमारी कुरान और शरीयत ही मुसलमानों का कानून है और हर मुसलमानों को पहले अपने इस कानून का पालन करना है।
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मुस्लिम पर्सनल लॉ कुरान और हदीस की रौशनी में भी बनाए गए हैं और उसमें तीन तलाक का जिक्र है। गुरुवार को आए हाईकोर्ट के फैसले की सराहना करते हुए वसंत कन्या महाविद्यालय की डॉ. नुजहत फातमा का कहना है कि तलाक सबसे बदतरीन चीज है। तीन तलाक बिलकुल भी जायज नहीं। जब निकाह गवाहों के बीच होता है तो तलाक भी गवाहों के बीच होना चाहिए। कोर्ट का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए।
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मुस्लिम महिला फाउंडेशन की अध्यक्ष नाजनीन अंसारी का कहना है कि ये महिलाओं के हक की पहली जीत है। अल्लाह को सबसे ज्यादा नापसंद कुछ है तो वो है तलाक। गुस्से में तलाक देकर मर्द गुनाह करते हैं लेकिन उस गुनाह की सजा महिला व उसके बच्चे भुगतते हैं।
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उधर मुफ्ती-ए-शहर मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी का कहना है कि कोर्ट के फैसला का पूरा सम्मान है लेकिन ये फैसला पूरी तरह से इस्लामी कानून के खिलाफ है। ये मुस्लिम पर्सनल लॉ के खिलाफ है। इसके लिए मुसलमान सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे।
उधर जमीअत-उल-उलेमा जिला बनारस के अब्दुल्ला फैसल कहते हैं कोर्ट का ये फैसला चौंकाने वाला है। हमारी कुरान और शरीयत ही मुसलमानों का कानून है और हर मुसलमानों को पहले अपने इस कानून का पालन करना है।