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Gyanvapi Case: ज्ञानवापी-श्रृंगार गौरी केस सुनवाई योग्य है या नहीं? 12 सितंबर को आएगा फैसला

Wed, 24 Aug 2022 05:11 PM IST
किरन रौतेला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: किरन रौतेला Updated Wed, 24 Aug 2022 05:11 PM IST
सार

ज्ञानवापी-श्रृंगार गौरी केस मामले की सुनवाई पूरी हो गई है। जिला कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा। 12 सितंबर को अगली सुनवाई होगी। 

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Gyanvapi Shringar Gauri Case Hearing completed District Court reserved the verdict
अदालत के बाहर हिंदू पक्ष के अधिवक्ता और पैरोकार - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ज्ञानवापी-श्रृंगार विवाद में मुकदमा आगे चलेगा या नहीं, इस पर फैसला 12 सितंबर को आ सकता है। जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश की कोर्ट में बुधवार को तीन घंटे से अधिक सुनवाई चली। वादिनी महिलाओं की दलीलों पर मुस्लिम पक्ष यानी अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी ने अपनी जवाबी बहस रखी। फिलहाल, जिला जज की कोर्ट में कई तारीखों से ऑर्डर-7 रूल-11 पर चल रही दोनों पक्ष की बहस पूरी हो चुकी है। 

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जिला जज की अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत ने सुनवाई की अगली तिथि 12 सितंबर तय की है। माना जा रहा है कि अब 12 सितंबर को अदालत अपना फैसला सुनाएगी कि मां श्रृंगार गौरी का केस आगे सुनवाई योग्य है या नहीं।

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मंदिर के ऊपर खड़ा किया मस्जिद का स्ट्रक्चर

श्रृंगार गौरी के नियमित दर्शन-पूजन और अन्य विग्रहों के सरंक्षण मामले में बुधवार को हिंदू पक्ष के अधिवक्ताओं ने कहा कि जो ज्ञानवापी मस्जिद औरंगजेब की सम्पत्ति बताई गई है वह उनकी पैतृक नहीं है। मस्जिद को जमीन समर्पित करने की बात भी फर्जी है और वहां मंदिर का स्ट्रक्चर है। उस पर मस्जिद का ढांचा खड़ा कर दिया गया।

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Gyanvapi Shringar Gauri Case Hearing completed District Court reserved the verdict
वाराणसी कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

वाद में दिए गए तथ्यों पर विचारण करने का अधिकार सिविल कोर्ट को है और यह विशेष उपासना स्थल एक्ट से बाधित नही है। हिंदू पक्ष ने कहा कि औरंगजेब आतताई था और मंदिर तोड़कर उसने मस्जिद बनवाया, लेकिन मस्जिद के पीछे मंदिर की दीवार छोड़ दी। यह कलंक है और आज भी चुभता है। जिला जज ने आदेश के लिए 12 सितंबर की तिथि नियत कर दी। 

मुस्लिम पक्ष ने क्या कहा
इससे पहले मुस्लिम पक्ष ने अपनी बहस पूरी कर ली। उनकी ओर से अंजुमन के अधिवक्ता शमीम अहमद ने काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट एक्ट और विशेष उपासना स्थल कानून का हवाला देते हुए कहा कि विश्वनाथ मंदिर का जिक्र है। उसमें नए व पुराने मंदर के बाबत कुछ नहीं कहा गया। साथ ही मस्जिद प्रापर्टी का जिक्र नहीं है।

एक्ट में मंदिर की व्यवस्था की देख रेख की बात कही गई है। मस्जिद के लिए कुछ नहीं कहा गया। 1942 में ही स्पष्ट हो गया था कि आराजी 9130 मस्जिद है और वह वक्फ सम्पत्ति है। इस बाबत 1944 में गजट भी जारी किया गया। 1936 के दीन मोहम्मद केस के निर्णय में कहा गया कि यह मस्जिद औरंगजेब के जमाने के पहले से है।


 

विशेष उपासना स्थल कानून 1991 में स्पष्ट है कि 15 अगस्त 1947 के बाद जो भी धर्म स्थल जिस रूप में होगा उसी रूप में रहेगा। हिंदू पक्ष वक्फ बोर्ड में दर्ज आलमगीर मस्जिद को धरहरा माधव बिंदु बता रहे हैं, वह गलत है। यह मस्जिद वक्फ बोर्ड में 221 पर दर्ज है और ज्ञानवापी 100 नं. पर दर्ज है।  इसके जवाब में हिंदू पक्ष ने अदालत में कहा कि अंजुमन इंतजमिया ने जो 1291 फसली वर्ष  का जो खसरा दाखिल किया है वह स्वामित्व का प्रमाणपत्र नहीं है।

उसकी वैधता की जांच का अधिकार सिविल कोर्ट को है। जो इंतजामिया कमेटी ने जमीन की अदला बदली की है वह सम्पत्ति देवता की है। ऐसे में मंदिर ट्रस्ट को और मसाजिद कमेटी को जमीन बदलने का कोई अधिकार नहीं है। यह जिला जज की अनुमति के बाद ही हो सकता है।

मुस्लिम पक्ष ने मांगा और समय, कोर्ट ने किया इनकार

कोर्ट में हिंदू पक्ष की बहस समाप्त होने के बाद अंजुमन इंतजामिया ने हिंदू पक्ष की दलीलों का जबाब देने के लिए कोर्ट से समय दिए जाने का अनुरोध किया। जिसे जिला जज ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस मामले में लंबी बहस हो चुकी है। आज सुबह साढ़े 11 से साढ़े 3 बजे तक इसी मामले की सुनवाई हुई, ऐसे में बहस का अवसर समाप्त करते हुए आदेश के लिए 12 सितंबर की तिथि नियत कर दी।

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