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गंगा प्रदूषणः काशी में पेशवाओं की निशानी पर मंडरा रहे संकट के बादल

Sun, 25 Feb 2018 10:46 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला,वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला,वाराणसी Updated Sun, 25 Feb 2018 10:46 AM IST
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Ganga pollution is causes for  danger ghat in varanasi
गंगा ने बदला रुख, दरकने के कगार पर हैं घाट - फोटो : अमर उजाला
गंगा के गुनहगारों ने उसका स्वरूप विकृत कर दिया। इससे गंगा की धारा का दबाव शहर की तरफ बढ़ता गया। इस परिवर्तन से काशी के खूबसूरत गंगा घाट ध्वस्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं। इससे पेशवा श्री गणेश मंदिर, ग्वालियर घाट, बूंदी परकोटा घाट, गंगा महल घाट, संकठा घाट, सिंधिया घाट, भोसले घाट पर धंसने की शुरुआत हो चुकी है।
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घाट की सीढ़ियां अब धीरे-धीरे सुरसरि की गोद में समाहित होने लगी हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, नदी के रुख में ऐसा परिवर्तन उसके प्राकृतिक स्वरूप में छेड़छाड़ के चलते हो रहा है। 90 साल पहले ही इसकी चेतावनी लॉर्ड इर्विन ने जारी कर दी थी।
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गायघाट से आगे बढ़ते ही बूंदी परकोटा घाट, शीतला घाट, लालघाट और हनुमान गढ़ी घाट पर गंगा की लहरों से अब घाट की सीढ़ियों तथा इमारतों के नीचे कटान शुरू हो गया है। सबसे खास बात तो यह है कि गंगा के बदलते स्वरूप के कारण किनारों पर गहराई बढ़ती जा रही है और बीच में गंगा की गहराई कम होती जा रही है।
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किनारों की जगह मिट्टी गायब होती जा रही है, उसकी जगह गंगा का पानी हिलोरें ले रहा है। पेशवाओं की भव्य निशानियां गंगा की लहरों में ही समाहित हो जाएंगी। गंगा महल घाट, संकठा घाट, सिंधिया घाट, भोसले घाट, राजा ग्वालियर घाट, पंचगंगा, बिंदुमाधव घाट, दुर्गाघाट पर पेशवाओं द्वारा निर्मित महल आज भी सभी के आकर्षण का केंद्र हैं। 

गहराई की बात करें तो पंचगंगा घाट के किनारों पर सबसे अधिक 26 मीटर गहराई हो चुकी है। अब नदी विशेषज्ञ आगाह कर रहे हैं कि गंगा का जलस्तर बढ़ाने की दिशा में गंभीर कदम नहीं उठाए गए तो इन धरोहरों को बचाना मुश्किल हो जाएगा।

केंद्रीय जल आयोग की ओर से 2015 में  किए गए सर्वे के अनुसार यह बात सामने आई थी कि गंगा बीच की बजाय किनारों पर गहरी होती जा रही हैं। केंद्रीय जल आयोग के अधिकारियों का कहना है कि खनन पर रोक लगने के कारण यह समस्या आ रही है। इसके चलते घाट पोले होते जा रहे हैं। 
 

Ganga pollution is causes for  danger ghat in varanasi
पेशवाओं की निशानी किसी भी दिन हो सकती है जमींदोज - फोटो : अमर उजाला
नमामि गंगे के सलाहकार मंडल के सदस्य और बीएचयू के नदी विज्ञानी प्रो. बीडी त्रिपाठी का कहना है कि जब काशी में गंगाजल पर्याप्त था, तब धारा घाटों की सीढ़ियों और सीढ़ियों के बाद गंगा में डाले गए पत्थर के बड़े-बड़े बोल्डरों से टकराते हुए आगे बढ़ जाती थी। अब ऐसा नहीं है।

धारा मुड़ी तो सीढ़ियों के बजाय, उनके नीचे की मिट्टी से टकराने लगी। परिणामस्वरूप मिट्टी धीरे-धीरे कटती जा रही है। सीढ़ियों के धंसान से होता हुआ इसका दुष्प्रभाव अब इमारतों तक जा पहुंचा है।

कछुआ सेंचुरी के चलते गंगा पार से बालू का उठान न होने के कारण भी गंगा का दबाव घाटों की ओर अधिक पड़ रहा है। उनका साफ कहना है कि मौजूदा स्थिति को देखते हुए गंगा जलस्तर में वृद्धि बहुत आवश्यक है। यदि इस दिशा में जल्द ही ठोस कदम नहीं उठाए गए तो काशी की मूर्त धरोहरों को बचा पाना कठिन होगा।

कैग की रिपोर्ट निराशाजनक

Ganga pollution is causes for  danger ghat in varanasi
गंगा किनारे की इमारतों के नीचे तक पहुंच गया कटान - फोटो : अमर उजाला
गंगा महासभा के महामंत्री स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती का कहना है 1927 में महामना मदन मोहन मालवीय के दबाव में अंग्रेज इंजीनियर ने गंगा के घाटों का सर्वे किया था और अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इसके अनुसार 90 साल के बाद काशी के घाट जर्जर हो जाएंगे और कभी भी ध्वस्त हो जाएंगे।

काशी तीर्थ सुधार ट्रस्ट ने इस रिपोर्ट पर आधारित पुस्तक भी छपवाई थी। गंगा मंत्रालय को 2015 में इसकी रिपोर्ट दी गई थी लेकिन उस दिशा में कोई कार्रवाई नहीं हुई।

गंगा में सुधार कुछ नहीं हुआ और हालात बदतर हो गए हैं। 2017 की कैग रिपोर्ट के अनुसार वित्तीय कुप्रबंधन, दूरदर्शिता के अभाव के कारण गंगा के लिए मिला धन भी खर्च नहीं हो सका।   
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