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काशी में आज भी जीवित है शास्त्रार्थ की प्राचीन परंपरा: स्वामी वासुदेवानंद 

Mon, 22 Feb 2021 10:33 PM IST
हरि User न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: हरि User Updated Mon, 22 Feb 2021 10:33 PM IST
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Foundation day of Shri Shastharth College Dashashwamedh Ghat Varanasi Swami Vasudevanand Saraswati
श्री शास्त्रार्थ महाविद्यालय के स्थापना दिवस पर बोलते स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती। - फोटो : अमर उजाला

श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सदस्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती ने कहा कि शास्त्रार्थ की प्राचीन परंपरा आज भी काशी में जीवंत है। इसका साक्षात उदाहरण है वाराणसी का शास्त्रार्थ महाविद्यालय। मनीषियों की इस तपोस्थली का मैं भी विद्यार्थी रहा हूं।

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वह सोमवार को दशाश्वमेध घाट स्थित श्री शास्त्रार्थ महाविद्यालय के 77वें स्थापना दिवस समारोह के अवसर पर आयोजित विद्वत गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि तर्क संग्रह व व्याकरण के मूल तत्व भी हमें इस जगह से प्राप्त हुए। इस संस्था ने अनेकानेक विद्वानों को संस्कृत के रक्षार्थ आगे बढ़ाया है। 
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संयासी होने के उपरांत भी प्रयागराज व काशी के बीच शास्त्रों के अर्थ का अध्ययन आज भी करता रहता हूं। संस्कृत के सर्वांगीण विकास में प्रत्येक सनातनी की यहां भागीदारी है। अध्यक्षता संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो यदुनाथ प्रसाद दुबे ने किया। सभा का संचालन करते हुए संस्था के प्राचार्य डॉ. गणेश दत्त शास्त्री ने संस्कृत महाविद्यालयों की बंद नियुक्तियों के संदर्भ में सरकार से अपनी बात को रखने का निवेदन किया।

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 स्वागत डॉ. राघव शरण मिश्र ने किया। महाविद्यालय के प्रबंधक डॉ. विनोद राव पाठक ने संस्था का वार्षिक कार्यवृत प्रस्तुत किया। इस अवसर पर विद्वानों का सम्मान भी हुआ। इस दौरान प्रो. हरि प्रसाद अधिकारी, प्रो. सुधाकर मिश्र, डॉ. आमोद दत शास्त्री, डॉ. सारनाथ पांडेय, डॉ. अशोक पांडेय, बृजेश शुक्ला, स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती, विनोद सिंह, प्रो. कमलाकांत त्रिपाठी, जयभारत, संदीप तिवारी, पं. शुभम शास्त्री, कन्हैया त्रिपाठी ने विचार व्यक्त किए। धन्यवाद ज्ञापन पवन शुक्ला और स्वागत सुरेंद्र सिंह सेखों ने किया।

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