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रतजगा: अनोखी परंपरा में शामिल हुए विदेशी, मुंह में घुली जलेबा की मिठास, दिल में उतरी कजरी; रात भर जागी काशी

Tue, 12 Aug 2025 06:11 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: अमन विश्वकर्मा Updated Tue, 12 Aug 2025 06:11 AM IST
सार

वाराणसी के विभिन्न क्षेत्रों में जलेबा की दुकानों देर रात तक सजी रहीं। बड़े-बड़े जलेबा दुकानों के बाहर टांगकर खूब दुकानदारी हुई। काशी में रतजगा की इस परंपरा में विदेशी भी शामिल हुए। जलेबा बनाने का तरीका भी सीखा।

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Foreigners joined this unique tradition Jalebi sweetness melted in mouth Kajri entered heart
बनारस में जलेबा छानते हलवाई। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Varanasi News: त्योहारों की नगरी बनारस में भादो महीने का पहला त्योहार रतजगा मनाया गया। रात भर मुंह में जलेबा की मिठास घुलती रही तो वहीं कहीं-कहीं कजरी की तान कानों को रस घोल रही थी। शहर से लेकर गांव तक रतजगा की परंपरा निभाई गई। जगह-जगह जलेबा की दुकानों पर लोगों ने जमकर खरीदारी की। पूरे जिले में 35 करोड़ से अधिक का जलेबा का कारोबार हुआ।

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रतजगा की परंपरा निभाने में काशीवासी ही नहीं विदेशी भी शामिल हुए। अस्सी पर जब स्पेन के इंजीनियर ने पत्नी संग जलेबा बनाना शुरू किया तो लोगों की भीड़ लग गई। स्पेन के कंप्यूटर इंजीनियर कार्लोस अपनी पत्नी इसाबेल के साथ बनारस घूमने पहुंचे। अस्सी स्थित पहलवान लस्सी की दुकान पर उन्होंने जब जलेबा देखा तो कुछ देर के लिए ठहर गए। 
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दुकानदार से उन्होंने पूछा तो उसने रतजगा के बारे में जानकारी दी। इसके बाद कार्लोस और इसाबेल ने जलेबा का स्वाद लिया और जलेबा बनाने का तरीका भी सीखा। दशाश्वमेध घाट, चौक, मैदागिन, विशेश्वरगंज, लहुराबीर, चेतगंज, सिगरा, महमूरगंज, पांडेयपुर, भोजूबीर, अर्दली बाजार, सारनाथ इलाकों में जलेबा की दुकानें सजाई गईं। शाम से ही दुकानों पर खरीदारों की भीड़ उमड़ने लगी थी। 
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व्यापारियों के अनुसार पूरे जिले भर में 35 करोड़ से अधिक का जलेबा का कारोबार हुआ है। अस्सी निवासी पद्मश्री प्रो. राजेश्वर आचार्य ने बताया कि रतजगा की परंपरा तो अब बस निभाई जा रही है। समय के साथ चीजें बदल गई हैं। पहले जहां रतजगा पर मोहल्लों में कजरी की तान सुनाई देती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। बस एक रस्म अदायगी ही बची है।

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बनारस में खूब बिका जलेबा। - फोटो : अमर उजाला

जलेबी तो साल भर मिलती है, जलेबा तो बस एक दिन
ग्रामीण इलाकों में सिंधौरा क्षेत्र की महिलाओं ने पारंपरिक कजरी गाई और जलेबा का आनंद लिया। बाजार में जलेबा की दुकानों पर खूब भीड़ रही। क्षेत्र के मिठाई कारोबारी नागेंद्र जायसवाल ने बताया कि बनारस जायकों का शहर है और जलेबी तो सालभर मिलती और बनती है, मगर जलेबा तो बस रतजगा के दिन ही काशी में मिलता है। भरतपुर, झंझोर, उदार, बरवा सहित कई गांवों में जलेबा की दुकानों पर शाम होते ही भीड़ लग गई। 

ग्रामीण संजय कुमार ने बताया कि आज के समय में रतजगा का पर्व धीरे-धीरे केवल जलेबा खाने-खिलाने की परंपरा तक सीमित हो गया है। पंडित रोशन दुबे ने कहा कि रतजगा का पर्व केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि यह ग्रामीण जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है। इस दिन का महत्व केवल जलेबा खाने तक सीमित नहीं है,बल्कि यह एक सामाजिक मिलन का भी प्रतीक है। महिलाएं एकत्र होकर कजरी गाती हैं, जो इस पर्व की विशेषता है। जबकि समय के साथ इस परंपरा में बदलाव आ रहा है।

मनाया गया कजरी तीज महोत्सव
निवेदिता शिक्षा सदन में कजरी तीज महोत्सव का आयोजन सोमवार को किया गया। मुख्य अतिथि माध्यमिक शिक्षा परिषद के अपर सचिव डॉ. विनोद कुमार राय और अध्यक्षता डॉ. हरेंद्र कुमार राय ने की। कार्यक्रम में पूर्वांचल की महत्वपूर्ण विधा कजरी गायन की मनमोहक प्रस्तुतियां विद्यालय की छात्राओं और अध्यापिकाओं ने दी। निर्देशन डॉ. पूनम शर्मा और विभा पांडेय ( गायन),सिद्धी भट्ट नृत्य और राकेश रोशन वाद्य यंत्र ने किया। संचालन मीनू यादव ने किया।

भारत विकास परिषद ने मनाया कजरी महोत्सव
भारत विकास परिषद की नीलकंठ शाखा ने रतजगा का आयोजन किया। मां भारती एवं स्वामी विवेकानंद के चित्र पर दीप जलाकर कार्यक्रम की शुरूआत हुई। नंदिनी सिंह व राजेश सिंह के आवास कृष्ण देव नगर में कजरी महोत्सव को धूमधाम से मनाया। प्रियंका मिश्रा ने एक से बढ़कर एक कजरी गीतों की प्रस्तुतियां दी। इस दौरान राकेश मौर्य, कमल कुमार सिंह, राजीव गुप्ता, उमा शंकर जायसवाल, ममता उपाध्याय, डॉ. आहुति सिंह मौजूद रहीं। कार्यक्रम संयोजिका गीता सिंह ने महिलाओं का स्वागत किया।

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