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कहि अनेक बिधि कथा पुरानी...
ब्यूरो, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Thu, 29 Sep 2016 01:49 AM IST
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रामनगर की प्रसिद्ध रामलीला
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कहि अनेक बिधि कथा पुरानी, भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी, बोले उचित बचन रघुनंदू, दिनकर कुल कैरव बन चंदू, तात जायं जियं करहु गलानी, ईस अधीन जीव गति जानी, तीनि काल तिभुअन मत मोरें, पुन्य सिलोक तात तर तोरें। गुरु वशिष्ठ को प्रणाम कर प्रभु श्रीराम आश्रम को जाते हैं। वहां भ्राता भरत के साथ उनके स्नेहमयी मिलन और भावुक संवाद से हर किसी आंखे नम हो जाती है।
लीला भरत जी के स्नान-ध्यान से शुरू होती है और भरत जी भगवान के पास बैठते हैं। तभी मुनि वशिष्ठ जी भरत को बुलाते हैं और सभी को बैठाकर कहते हैं, श्रीराम आप सबके हृदय में वास करते हैं। भरत को समझाते हुए उन्होंने कहा कि हे तात ग्लानि करने से कुछ होने वाला नहीं है। श्रीराम का स्नेह तुम्हारे साथ है। भगवान श्रीराम और भरत का स्नेह देखकर वृहस्पति देवताओं से कहते हैं कि अपना मन स्थिर करो, भरत को प्रभु की परछाई जानो।
इस बीच जनकदूत का आगमन होता है। वशिष्ष्ठजी जनकदूत विदेहराज की कुशलता पूछते हैं। जनकजी का आगमन सुन श्रीराम पूरे समाज सहित चलकर उन्हें पूरे आदर के साथ लाते हैं। जनकजी सीता से कहते हैं, हे पुत्री तुमने पिता का कुल पवित्र किया है। प्रभु उन्हें प्रणाम कर आश्रम को जाते हैं। तब जनकजी सोचने लगते हैं कि उन्होंने यहां आकर अच्छा नहीें किया। इसी सोच में डूबे महाराज जनक से भरत कहते हैं कि आप पूज्य पिता के समान हैं। सभी श्रीराम के पास पहुंचते हैं। वहां भ्राता भरत की व्याकुलता देखकर श्रीराम अधीर हो उठते हैं और उन्हें समझाते हैंैं। बुधवार को रामनगर की रामलीला के 13वें दिन वशिष्ठ सभा, चित्रकूट जनकागमन तथा सभा की लीला का मंचन किया गया।
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लीला भरत जी के स्नान-ध्यान से शुरू होती है और भरत जी भगवान के पास बैठते हैं। तभी मुनि वशिष्ठ जी भरत को बुलाते हैं और सभी को बैठाकर कहते हैं, श्रीराम आप सबके हृदय में वास करते हैं। भरत को समझाते हुए उन्होंने कहा कि हे तात ग्लानि करने से कुछ होने वाला नहीं है। श्रीराम का स्नेह तुम्हारे साथ है। भगवान श्रीराम और भरत का स्नेह देखकर वृहस्पति देवताओं से कहते हैं कि अपना मन स्थिर करो, भरत को प्रभु की परछाई जानो।
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इस बीच जनकदूत का आगमन होता है। वशिष्ष्ठजी जनकदूत विदेहराज की कुशलता पूछते हैं। जनकजी का आगमन सुन श्रीराम पूरे समाज सहित चलकर उन्हें पूरे आदर के साथ लाते हैं। जनकजी सीता से कहते हैं, हे पुत्री तुमने पिता का कुल पवित्र किया है। प्रभु उन्हें प्रणाम कर आश्रम को जाते हैं। तब जनकजी सोचने लगते हैं कि उन्होंने यहां आकर अच्छा नहीें किया। इसी सोच में डूबे महाराज जनक से भरत कहते हैं कि आप पूज्य पिता के समान हैं। सभी श्रीराम के पास पहुंचते हैं। वहां भ्राता भरत की व्याकुलता देखकर श्रीराम अधीर हो उठते हैं और उन्हें समझाते हैंैं। बुधवार को रामनगर की रामलीला के 13वें दिन वशिष्ठ सभा, चित्रकूट जनकागमन तथा सभा की लीला का मंचन किया गया।
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