असि और वरुणा नदी के अस्तित्व पर खतरा: डीएम साहब, क्या असि को इमारतों की छत से कराएंगे प्रवाहित
वाराणसी की असि और वरुणा नदी के नाम से ही शहर को नाम दिया गया है। अब इन नदियों में सीवर का पानी जाकर मिल रहा है। साथ ही इनके किनारे अवैध निर्माण हो रहे हैं।
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धर्म नगरी काशी को वाराणसी नाम देने वाली दो नदियां वरुणा और असि के हालात देखकर इसे वाराणसी कहना बेमानी लगता है। असि को तो सरकारी कागजों में भी नाला घोषित कर दिया गया है, एनजीटी की सख्ती के बाद जिला प्रशासन हरकत में तो आया है, लेकिन असि को अतिक्रमण से मुक्त कराना क्या इतना मुश्किल है।
असि नदी संघर्ष समिति के संयोजक गणेश शंकर चतुर्वेदी ने कहा कि जब नदी कोख तक पाट दी जाएगी तो क्या डीएम साहब छतों से नदी बहाएंगे। सरकार तो इस नदी को राष्ट्रीय जलमार्ग से जोड़ रही थी, लेकिन असि तट पर रवींद्रपुरी पुल के बीच खाली पड़ी जमीन पर भी बकायदा गेट लगाकर चहारदीवारी बनाकर इमारत बनाने व जमीन बेचने का खेल हो रहा है। कोरोना काल की बंदी का फायदा उठाते हुए भूमाफियों ने कई अवैध निर्माण कर लिए हैं। लॉकडाउन में असि पर अत्रिक्रमण करके उसकी कोख तक पत्थर से भरी जा रही है। जिला प्रशासन ने अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया तो हम आंदोलन करने के लिए बाध्य होंगे। असि महज जलस्त्रोत नहीं एक दर्शन है।
नदियों का अनुपात बिगड़ने से खराब होगी भूमिगत जल की स्थिति
पुराणों में काशी क्षेत्र के उत्तर में वरुणा, पूर्व में गंगा और दक्षिण में असि नदी का उल्लेख मिलता है। ये तीनों प्राकृतिक रूप से काशी को स्थिरता प्रदान करती हैं। नदियों का अनुपात बिगड़ने से भूमिगत जल की उपलब्धता में असंतुलन उत्पन्न होगा। भविष्य में इसके भयावह परिणाम भुगतने होंगे।
नदी विज्ञानी प्रो. यूके चौधरी ने बताया कि गंगा के जलस्तर में निरंतर गिरावट और भूमिगत जल के दोहन ने असि नदी को नाला बना दिया, क्योंकि भूमिगतजल का सतहीजल में परिवर्तन होने का नाम ही नदी है। जब भूमिगत जल का स्तर नदी के स्तर से नीचे जाएगा नदियां सूख जाएंगी। किसी भी नदी को बचाने के लिए बैंक स्टोरेज की स्थापना बेहद जरूरी है जो नदी के मूल प्रवाह को बरसात के बाद बरकरार रख सके।
बीएचयू के गंगा रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के मुताबिक वरुणा-असि नदी का अपना मौलिक जल, गुण, मात्रा और आवेग हुआ करता था। जो नगर के भूमिगत जल स्तर को संतुलित करने के साथ ही गंगा के कटान क्षेत्र में बंधा का काम करता था। इन नदियों का जल, गुण, मात्रा और आवेग का आपसी तालमेल जिस अनुपात में बिगड़ेगा नगर की स्थिरता व भूमिगत जल उपलब्धता तथा गुण का संतुलन भी उसी अनुपात में बिगड़ता जाएगा।
90 डिग्री कोण पर गंगा से मिला दिया असि को
काशी विश्वनाथ मंदिर के पूर्व न्यास अध्यक्ष आचार्य अशोक द्विवेदी ने कहा कि गंगा के दक्षिणी मोड़ पर मिलने वाली असि नदी को अब नदी मानने में कठिनाई होती है। वजह, इसका वजूद आज अस्सी नाला के रूप में ही शेष रह गया है। गंगा-वरुणा के सतह से काफी ऊंचाई पर बहने वाली इस नदी का गंगा में प्राकृतिक संगमीय कोण 45 से 60 डिग्री हुआ करता था। वर्तमान में अप्राकृतिक रूप से इसे स्थानांतरित कर दक्षिणी छोर पर ही तकरीबन 90 डिग्री कोण से गंगा में मिलाया गया है और इसमें नदी के एक भी चारित्रिक गुण नहीं है। जबकि प्राचीन पुराण काल में इसको शुष्का नदी के नाम से बहुधा पुकारा गया है। यहां तक कि इससे संबद्ध शिवलिंग का नाम भी शुष्केश्वर कहा गया है। जबालोपनिषद में इसका उल्लेख नाशी के रूप में किया गया है। काशी खंड में कहा गया है कि संसार के सभी तीर्थ असिसमेद के षोडशांश के भी बराबर नहीं होते। यहां स्नान करने से सभी तीर्थो के स्नान का फल मिल जाता है।