{"_id":"5f63c0498ebc3e32a50af0e3","slug":"dr-bhagvan-das-city-news-vns5478735124","type":"story","status":"publish","title_hn":"सरस्वती और लक्ष्मी के वरदपुत्र थे डॉ. भगवानदास","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सरस्वती और लक्ष्मी के वरदपुत्र थे डॉ. भगवानदास
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
वाराणसी। काशी के प्रथम भारत रत्न डॉ. भगवान दास ऐसी विभूति थे जिन्हें सरस्वती और लक्ष्मी दोनों का वरदपुत्र कहा जा सकता है। वैसे काशी विद्या और विद्वता का सनातन गढ़ रहा है, लेकिन आधुनिक दौर की काशी की विद्वत परंपरा में ऐसी कई विभूतियां हुईं जो नगर के सम्मानित श्रेष्ठी रईस भी थे और शिक्षा, ज्ञान, साहित्य, कला, पत्रकारिता आदि क्षेत्रों भी जिनकी अमिट छाप रही है। 12 जनवरी 1869 को जन्मे भगवान दास महात्मा गांधी से नौ महीने बड़े पर प्रतिबद्ध गांधीवादी थे।
महामना मालवीय द्वारा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की पृष्ठभूमि में उनका बड़ा योगदान था। वस्तुत: एनीबेसेंट के साथ थियोसाफिकल सोसायटी और होम रूल आंदोलन के वह मेरुदंड रहे। उनके सहयोग से ही थियोसाफिकल सोसायटी का केंद्र कमच्छा बना और वहीं हिन्दू स्कूल की संस्थापना हुई, जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की बुनियाद बना। बाद में वह वहां दर्शन शास्त्र के शिक्षण से भी जुड़े लेकिन किंचित मतभेदों के चलते असहयोग आन्दोलन शुरू होने से थोड़ा पहले ही उन्होंने बीएचयू से त्याग पत्र दे दिया। काशी के प्रथम और देश के चौथे भारत रत्न से सम्मानित भगवान दास की मृत्यु 18 सितंबर 1958 को हुई।
गांधी जी के आग्रह को नहीं टाल सके
बाबू शिव प्रसाद गुप्त के मन में जब बिना शासकीय सहायता के शिक्षण संस्थान स्थापित करने का विचार आया तो उन्होंने भगवान दास जी से भी संपर्क किया, लेकिन पहले उन्होंने अनमयस्कता दिखाई। उसी समय गांधी जी का असहयोग आन्दोलन शुरू हुआ, जिसके रचनात्मक कार्यक्रमों में राष्ट्रीय शिक्षा के विद्यापीठों का राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन भी शामिल था। गुप्त जी और गांधी जी की भेंट के बाद काशी विद्यापीठ की संस्थापना का विचार अंकुरित हुआ, जिसमें बहिष्कार में कूदे असहयोगी शिक्षक और विद्यार्थी हों। गांधी जी ने डॉ. भगवान दास को एक पत्र इसमें सहयोग के लिये लिखा और जब शिव प्रसाद जी ने वह पत्र उन्हें दिया तो वह तैयार हो गये। फलत: वह काशी विद्यापीठ के प्रथम आचार्य कुलपति हुये। महात्मा गांधी के मार्गदर्शन से डॉ. भगवान दास के शैक्षिक नेतृत्व में बाबू शिव प्रसाद द्वारा संस्थापित विद्यापीठ स्वतंत्रता आन्दोलन की नर्सरी और वैचारिक कार्यशाला बना।
विज्ञापन
काशी के प्रथम नागरिक भी बने डॉ. भगवान दास
1921 और 1930 के गांधी के असहयोग एवं सविनय अवज्ञा आन्दोलनों में जेल भी गए और 40 के दशक में काफी समय तक बनारस जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में भी काशी में स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों का निर्देशन करते रहे। 1922 में बनारस म्युनिसिपल बोर्ड के चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद वह उसके अध्यक्ष के रूप में काशी के प्रथम नागरिक रहे। 1935 के अधिनियम के आधार पर जब प्रांतीय विधायिका के चुनाव हुए तो वह विधायक भी निर्वाचित हुए थे।
बिना पद के ही प्रतिष्ठा थी यथावत
डॉ. भगवान दास मूलत: एक दार्शनिक थे और राजनीति उनके लिये आजादी की लड़ाई के दौर का युगधर्म भर था। यही कारण है कि आजादी के बाद उन्होंने राजनीति से विरक्ति का भाव रखा और राजनीतिक पदों के प्रस्ताव ठुकरा दिए । उनके सुयोग्य पुत्र तथा शिक्षाविद, सम्पादक, लेखक रहे श्री प्रकाश जी को केन्द्र सरकार में मंत्री, भारत के राजदूत और कई राज्यों में राज्यपाल पद को सुशोभित करने का अवसर अवश्य मिला। बिना पद के भी डॉ. भगवान दास की प्रतिष्ठा यथावत थी और 1955 में प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने उन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल की संस्तुति पर भारत के शीर्ष सम्मान भारत रत्न से नवाजा। काशी में उसके बहुत बाद यह सम्मान केवल शहनाई वादक स्व. बिस्मिल्लाह खां को प्राप्त हुआ।
कहे जाते थे दार्शनिक राजनेता
डॉ. भगवान दास हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत भाषा पर गहरी पकड़ के साथ एक ऐसे दार्शनिक थे जिसे दार्शनिक राजनेता कहा जा सकता है। ढाई दर्जन प्रशस्त ग्रंथों का उन्होंने लेखन किया था। वह सभी धर्म दर्शनों के मर्मज्ञ विद्वान थे जिनका सभी धर्मों के साझे मूल्यों में गहरा विश्वास था। इस संदर्भ में मूलत: अंग्रेजी में लिखी गई सभी धर्मों की तात्विक एकता उनकी चर्चित पुस्तक रही है। -प्रो. सतीश राय, राष्ट्रीय समन्वयक, राजीव गांधी स्टडी सर्किल व पूर्व विभागाध्यक्ष, काशी विद्यापीठ
विज्ञापन
महामना मालवीय द्वारा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की पृष्ठभूमि में उनका बड़ा योगदान था। वस्तुत: एनीबेसेंट के साथ थियोसाफिकल सोसायटी और होम रूल आंदोलन के वह मेरुदंड रहे। उनके सहयोग से ही थियोसाफिकल सोसायटी का केंद्र कमच्छा बना और वहीं हिन्दू स्कूल की संस्थापना हुई, जो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की बुनियाद बना। बाद में वह वहां दर्शन शास्त्र के शिक्षण से भी जुड़े लेकिन किंचित मतभेदों के चलते असहयोग आन्दोलन शुरू होने से थोड़ा पहले ही उन्होंने बीएचयू से त्याग पत्र दे दिया। काशी के प्रथम और देश के चौथे भारत रत्न से सम्मानित भगवान दास की मृत्यु 18 सितंबर 1958 को हुई।
विज्ञापन
गांधी जी के आग्रह को नहीं टाल सके
बाबू शिव प्रसाद गुप्त के मन में जब बिना शासकीय सहायता के शिक्षण संस्थान स्थापित करने का विचार आया तो उन्होंने भगवान दास जी से भी संपर्क किया, लेकिन पहले उन्होंने अनमयस्कता दिखाई। उसी समय गांधी जी का असहयोग आन्दोलन शुरू हुआ, जिसके रचनात्मक कार्यक्रमों में राष्ट्रीय शिक्षा के विद्यापीठों का राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन भी शामिल था। गुप्त जी और गांधी जी की भेंट के बाद काशी विद्यापीठ की संस्थापना का विचार अंकुरित हुआ, जिसमें बहिष्कार में कूदे असहयोगी शिक्षक और विद्यार्थी हों। गांधी जी ने डॉ. भगवान दास को एक पत्र इसमें सहयोग के लिये लिखा और जब शिव प्रसाद जी ने वह पत्र उन्हें दिया तो वह तैयार हो गये। फलत: वह काशी विद्यापीठ के प्रथम आचार्य कुलपति हुये। महात्मा गांधी के मार्गदर्शन से डॉ. भगवान दास के शैक्षिक नेतृत्व में बाबू शिव प्रसाद द्वारा संस्थापित विद्यापीठ स्वतंत्रता आन्दोलन की नर्सरी और वैचारिक कार्यशाला बना।
विज्ञापन
काशी के प्रथम नागरिक भी बने डॉ. भगवान दास
1921 और 1930 के गांधी के असहयोग एवं सविनय अवज्ञा आन्दोलनों में जेल भी गए और 40 के दशक में काफी समय तक बनारस जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में भी काशी में स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों का निर्देशन करते रहे। 1922 में बनारस म्युनिसिपल बोर्ड के चुनाव में कांग्रेस की जीत के बाद वह उसके अध्यक्ष के रूप में काशी के प्रथम नागरिक रहे। 1935 के अधिनियम के आधार पर जब प्रांतीय विधायिका के चुनाव हुए तो वह विधायक भी निर्वाचित हुए थे।
बिना पद के ही प्रतिष्ठा थी यथावत
डॉ. भगवान दास मूलत: एक दार्शनिक थे और राजनीति उनके लिये आजादी की लड़ाई के दौर का युगधर्म भर था। यही कारण है कि आजादी के बाद उन्होंने राजनीति से विरक्ति का भाव रखा और राजनीतिक पदों के प्रस्ताव ठुकरा दिए । उनके सुयोग्य पुत्र तथा शिक्षाविद, सम्पादक, लेखक रहे श्री प्रकाश जी को केन्द्र सरकार में मंत्री, भारत के राजदूत और कई राज्यों में राज्यपाल पद को सुशोभित करने का अवसर अवश्य मिला। बिना पद के भी डॉ. भगवान दास की प्रतिष्ठा यथावत थी और 1955 में प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने उन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल की संस्तुति पर भारत के शीर्ष सम्मान भारत रत्न से नवाजा। काशी में उसके बहुत बाद यह सम्मान केवल शहनाई वादक स्व. बिस्मिल्लाह खां को प्राप्त हुआ।
कहे जाते थे दार्शनिक राजनेता
डॉ. भगवान दास हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत भाषा पर गहरी पकड़ के साथ एक ऐसे दार्शनिक थे जिसे दार्शनिक राजनेता कहा जा सकता है। ढाई दर्जन प्रशस्त ग्रंथों का उन्होंने लेखन किया था। वह सभी धर्म दर्शनों के मर्मज्ञ विद्वान थे जिनका सभी धर्मों के साझे मूल्यों में गहरा विश्वास था। इस संदर्भ में मूलत: अंग्रेजी में लिखी गई सभी धर्मों की तात्विक एकता उनकी चर्चित पुस्तक रही है। -प्रो. सतीश राय, राष्ट्रीय समन्वयक, राजीव गांधी स्टडी सर्किल व पूर्व विभागाध्यक्ष, काशी विद्यापीठ