वाराणसी: पंचक्रोशी परिक्रमा पर संशय, प्रशासन की अनुमति का इंतजार
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अधिमास में होने वाली काशी खंड की पंचक्रोशी परिक्रमा पर अभी संशय बना हुआ है। कोरोना संक्रमण के कारण श्रद्धालु भी प्रशासन के दिशा निर्देशों का इंतजार कर रहे हैं। 18 सितंबर से अधिमास की शुरूआत से ही पंचक्रोशी की परिक्रमा आरंभ हो जाती है। वहीं प्रशासन भी अभी पंचक्रोशी परिक्रमा को लेकर मंथन कर रहा है।
कोरोना संक्रमण के कारण लगी पाबंदियों के कारण पंचक्रोशी परिक्रमा करने वाले श्रद्धालु चिंतित हैं। उनका कहना है कि काशीखंड की यह पंचक्रोशी यात्रा के लिए अभी तक कोई दिशा निर्देश नहीं मिला है। काशी की प्रमुख यात्राओं के संयोजक उमाशंकर ने बताया कि पंचक्रोशी परिक्रमा पर अभी तक कोई निर्णय नहीं हुआ है।
हम लोगों ने प्रशासन को इस मामले में पत्र लिखा है। उनकी अनुमति के बाद ही इस पर कोई निर्णय लिया जाएगा। जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा का कहना है कि पंचक्रोशी परिक्रमा के पिछले साल के आयोजनों का आंकलन किया जा रहा है। सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद पंचक्रोशी परिक्रमा पर निर्णय लिया जाएगा।
मणिकर्णिका कुंड से होता है यात्रा का आरंभ
पंचक्रोशी यात्रा का आरंभ मणिकर्णिका कुंड से होता है। कहा जाता है कि यह कुंड गंगा से भी प्राचीन है। उपाख्यानों ने इस कुंड को शिव, शक्ति और विष्णु से जोड़ते हुए हिंदू धर्म के तीनों संप्रदायों के लिए इसे महत्वपूर्ण बताया गया है। भक्त इस कुंड में डुबकी लगाकर अपनी अंजुली में पानी लेकर यात्रा करने का संकल्प करते हैं।
संकल्प लेकर भक्तगण नाव से अस्सी घाट की ओर बढ़ते हैं और यहीं से यात्रा का वास्तविक आरंभ होता है। इसके बाद कर्दमेश्वर, भीमचंडी, रामेश्वर, शिवपुर, कपिलधारा होते हुए मणिकर्णिका पर यात्रा का समापन होता है। लगभग 80 किलोमीटर की यह यात्रा श्रद्धालु पैदल ही तय करते हैं।
त्रेता और द्वापर के भी हैं प्रमाण
कहा जाता है कि त्रेता युग में भगवान राम ने अपने तीनों भाइयों और पत्नी सीता के साथ पंचक्रोशी यात्रा की थी। इनके द्वारा स्थापित किए गए शिवलिंग रामेश्वर मंदिर में हैं। द्वापर युग में पांडवों ने यह यात्रा द्रौपदी के साथ की थी। इनके द्वारा स्थापित किए गए शिवलिंग शिवपुर के पांडव मंदिर में हैं।