धानापुर कांड: जब बनारस के लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह कर दिया, तिरंगा फहराने की कहानी
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अधिवक्ता अरुण कुमार पांडेय की जुबानी स्व पं. उमाकांत पांडेय ने क्रांतिकारियों की तरफ से मुकदमा लड़ा था। वाराणसी से करीब 28 मील दूर धानापुर थाना है, जो अब चंदौली में है। बारह अगस्त को आंदोलनकारियों ने अदालत की पत्रावलियां तहस-नहस कर दीं।
घटना की शुरुआत 12 अगस्त सन 1942 को शुरू हो गई, जब हेतमपुर के क्रांतिकारी स्व. कामता प्रसाद विद्यार्थी के नेतृत्व में आंदोलनकारी ग्राम गुरेहु पहुंचे। वहां उस समय के सहायक राजस्व अधिकारी बंदोबस्त अधिकारी कामता प्रसाद अवस्थी अपने अदालत में बैठकर सुनवाई कर रहे थे।
कामता प्रसाद विद्यार्थी पहुंचे और वहां मौजूद लोगों के सामने जबरदस्त भाषण दिया। आम लोगों से अपील की कि वे अदालती कार्यवाही का बायकाट करें। अधिवक्ता अरुण कुमार पांडेय ने बताया कि विद्यार्थी ने सहायक राजस्व अधिकारी से भी अपील की कि वे अदालत से उठकर चैंबर में चले जाएं लेकिन अधिकारी ने मना कर दिया। फिर क्या था क्रांतिकारी कामता प्रसाद विद्यार्थी के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने वहां रखे समस्त फाइलों को फाड़ दिया।
बंदोबस्त अधिकारी कामता प्रसाद अवस्थी को वहां से भागना पड़ गया और धानापुर थाने जाकर कामता प्रसाद विद्यार्थी, गुलाब सिंह, राजनारायण सिंह व अज्ञात 25 व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर थानाध्यक्ष अनवारूल हक ने दर्ज की थी। घटना के बाद क्रांतिकारियों में और भी जोश आ गया।
14 अगस्त को तहस-नहस कर दिया सकलडीहा रेलवे स्टेशन
14 अगस्त 1942 को फिर से कामता प्रसाद विद्यार्थी के नेतृत्व में आंदोलनकारी चंदौली तहसील पहुंचे। उन दिनो चंदौली बनारस की एक तहसील थी। वहां तिरंगा फहराया गया। तिरंगा फहराने के बाद सभी आंदोलनकारी सकलडीहा रेलवे स्टेशन पहुंचे। रेलवे लाइन उखाड़ दी गई।
लाइन के दोनों ओर के तार काट दिए गए। रेलवे स्टेशन मास्टर सकलडीहा ने थानाध्यक्ष सकलडीहा भगवती सिंह को एक एफआईआर लिख कर दी, जिसमें कहा गया कि सुबह सात बजे कामता प्रसाद विद्यार्थी अपने 100 साथियों के साथ रेलवे स्टेशन पहुंचे। भीड़ ने रेलवे लाइन उखाड़ी, तार काट दिए, रेलवे की संपत्ति लूट ली, सरकारी कागजात जला दिए। कांस्टेबल नंबर 28 राम नरेश सिंह ने जब प्रतिरोध किया तो उसे जान से मारने की धमकी दी।
उत्साह था सातवें आसमान पर
गुरेहु गांव में अदालत में तोड़फोड़ करने, तहसील चंदौली मे तिरंगा फहराने, सकलडीहा रेलवे स्टेशन की घटना से आंदोलनकारियों का उत्साह सातवें आसमान पर पहुंच गया। उनमें जबरदस्त उत्साह का संचार हो गया और आंदोलनकारियों ने थाना धानापुर में तिरंगा फहराने का निश्चय किया।
थाना धानापुर मे तिरंगा फहराने के उद्देश्य से तैयारी होने लगी। महाइच परगना के सभी 35 गांवों के लोग इस योजना को मूर्तरूप देने के लिए इकट्ठा हो गए। सभाएं होने लगीं। थाने पर तिरंगा फहराने की आंदोलनकारियों की योजना है, यह जानकारी थानाध्यक्ष अनावरुल हक को प्राप्त हो गई थी और उसने बनारस के एस पी को यह सूचना भेजवा दी थी।
अभियोजन के अनुसार 16 अगस्त 1942 को सुबह धानापुर के जमींदार कालिया साहब की छावनी पर सभी आंदोलनकारी इकट्ठा हुए। उसके पहले मदाहु गांव के केदार सिंह और नोनारी गांव के विश्वनाथ सिंह आंदोलनकारियों के लिए खानेपीने का प्रबंध किया था।
घटना के एक दिन पुर्व विश्वनाथ सिंह व केदार सिंह धानापुर में रामलगन के पास आए और यह कहा कि कल कालिया साहब की छावनी पर सभी लोग इकट्ठा होंगे। आप खाने का प्रंबंध करके रखिएगा। रामलगन इस पर सहमत हो गया, परंतु दूसरे दिन सबेरे जब लोग पहुंचे तो वहां पर कोई व्यवस्था नहीं थी।
इस पर मन्नी सिंह, महावीर सिंह, रामनाथ रस्तोगी जो तीनों अभियुक्त थे आश्चर्य में पड़ गए, तुरंत सब इंतजाम हुआ। धीरे-धीरे भीड़ इकट्ठी होती गई। भीड़ के मनोरंजन के लिए रामप्रसाद मल्लाह ने गाने गाए। सभा को संबोधित करते हुए कामता प्रसाद विद्दार्थी ने कहा कि स्वराज आ गया है।
हम लोगों को थाना धानापुर पर तिरंगा फहराना है। भीड़ में सभी लोग लाठी-डंडों से लैस थे। विद्यार्थी जी ने ललकारा अब देर करने की जरूरत नहीं है, आगे बढ़िए और थाने पर तिरंगा फहरा दीजिए। जुलूस का नेतृत्व कामता प्रसाद विद्यार्थी, मन्नी सिंह, हर नारायण अग्रहरी कर रहे थे।
भीड़ मे करीब पांच हजार लोग थे। भीड़ थाने से मात्र दस ग्यारह मीटर पर जमी थी। थाने पर ताला चढ़ा था। भीड़ आगे बढ़ने लगी। थानेदार अनवारुल हक ने भीड़ को आगे बढ़ने से मना किया।
भीड़ मानने को तैयार नहीं थी। ईंट पत्थर चलने लगे। इतने में करीब दस व्यक्ति थाने के दरवाजे की ओर बढ़े और मुख्य दरवाजा लांघने का प्रयास किया। गेट पर उन लोगों के चढ़ते ही थानाध्यक्ष अनवारूल हक ने गोली चला दी। सात व्यक्ति घायल हो गए।
घायल व्यक्तियों को लोग उठाकर धानापुर बाजार ले आए। गोली चलने से भीड़ तितर-बितर होने लगी। कामता प्रसाद विद्यार्थी ने ललकारा या तो हम लोग शहीद होंगे या इस दरोगा को ही मार डालेंगे। भीड़ और दरोगा में गर्मागरम बहस होने लगी।
हर नारायण अग्रहरि ने तभी अचानक दरोगा को पीछे से पकड़ लिया भीड़ ने दरोगा को मार डाला। हेड कांस्टेबुल अब्दुल खैर, क्लर्क वसी अहमद, कांस्टेबल अब्बास खान को भी भीड़ ने मार डाला। पूरा थाना लूट लिया गया।
उस दिन रविवार होने के कारण थाने में ही पोस्ट ऑफिस का बक्सा रखा था। आंदोलनकारियों ने उसे भी लूट लिया। सारे कागजात सहित थाने को फूंक दिया गया। घटना के बाद 18 अगस्त को ब्रिटिश फौज वहां पहुंची और थाने के सामने कुएं से टूटी बंदूक और पुलिस की वर्दी बरामद की।