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खतरनाक: भूजल में नाइट्रेट-सल्फेट की मात्रा दोगुना, 100-115 मिग्रा. प्रति लीटर मात्रा; पीने लायक नहीं है पानी
Tue, 04 Jun 2024 12:26 PM IST
अमन विश्वकर्मा
पंकज चौबे, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
पंकज चौबे, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
Published by: अमन विश्वकर्मा
Updated Tue, 04 Jun 2024 12:26 PM IST
सार
Varanasi News: भूजल में नाइट्रेट बढ़ने का प्रमुख कारण खेतीबारी में रासायनिक खादों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल माना जा रहा है। ज्यादा उपज के लालच में नाइट्रोजन खाद का अधिक उपयोग मिट्टी की सेहत बिगाड़ने के साथ ही पीने पानी को भी प्रदूषित कर रहा है।
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नदियों का जलस्तर घटने से तलहटी दिखाई दें रही है।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
गंगा बेसिन के तेजी से नीचे खिसकते भूजल में सेहत के लिए खतरनाक तत्वों का प्रदूषण भी घुला है। बीएचयू के एक शोध में गंगा और उसकी सहायक नदियों के आसपास के इलाकों के भूमिगत जल में नाइट्रेट और सल्फेट की मात्रा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के निर्धारित मानक से काफी अधिक मिली है।
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इससे संबंधित इलाकों का पानी सीधे पीने लायक नहीं रह गया है। भूमिगत जलस्तर में प्रदूषण की स्थिति पर लगभग एक वर्ष से चल रहे शोध के आंकड़े चिंतित करने वाले हैं। भूजल में नाइट्रेट की अधिकता सेहत के लिए खतरनाक मानी जाती है। खास तौर पर नवजात बच्चों में यह गंभीर बीमारी की वजह बन सकती है।
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बीएचयू के पर्यावरण और धारणीय विकास संस्थान की ओर से कराए जा रहे शोध में उत्तर प्रदेश के लखनऊ, जौनपुर, वाराणसी और गाजीपुर के अलग-अलग स्थानों से लिए गए भूजल के सैंपल में नाइट्रेट और सल्फेट की मात्रा काफी अधिक पाई गई है। डब्ल्यूएचओ ने भूजल में 45 से 50 मिग्रा/प्रतिलीटर से अधिक की नाइट्रेट और सल्फेट की मात्रा को खतरनाक माना है। जबकि इन इलाकों के पानी में नाइट्रेट और सल्फेट की मात्रा 100 से 115 मिग्रा. प्रति लीटर मिली है।
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भूजल पर शोध कर रहे बीएचयू के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. कृपा राम के मुताबिक गंगा और चयनित जिलों की प्रमुख नदियों के आसपास के इलाकों से भूजल के पानी सैंपल लिए गए थे। प्रमुख रूप से उन क्षेत्रों को अध्ययन के लिए चुना गया, जहां नदी शहर में प्रवेश करती है और जहां शहर से बाहर निकलती है।
इन स्थानों से लिए गए भूजल के सैंपल
वाराणसी : रविदास घाट, अस्सी घाट, राजघाट आदि के अलावा रामनगर पुल के पास सैंपल लिया गया। इनमें से रामनगर के भूजल में नाइट्रेट की मात्रा कम पाई गई।
जौनपुर : कचहरी, हुसैनाबाद, जेसीज चौराहा, वाजिदपुर, मियांपुर, जौनपुर जेल, दीवानी कचहरी, मातापुर, आंबेडकर तिराहा, पॉलिटेक्निक, सुक्खीपुर आदि।
गाजीपुर : पत्थरघाट, लॉर्ड कॉर्नवालिस, बड़ा महादेव घाट, सिकंदरपुर घाट, नवापुरा घाट, गोला घाट, चेतनाथ घाट, नकटवा घाट, पोस्ता घाट, मुक्तिधाम घाट, सीताराम मंदिर। गाजीपुर के भूजल में फ्लोराइड मिला है। इससे दांतों में पीलेपन की बीमारी होती है।
नवजात शिशुओं के लिए ज्यादा खतरनाक
पीने के पानी में नाइट्रेट की अधिकता जैविक प्रदूषण का भी संकेत माना जाता है। चिकित्सकों के मुताबिक ज्यादा नाइट्रेट के उपभोग से खून में ऑक्सीजन के प्रवाह पर असर पड़ सकता है। खास तौर पर नवजात शिशुओं में मिथे मोग्लोबोनिया (शरीर नीला पड़ जाता है।) बीमारी हो जाती है। इसे ब्लू बेबी सिंड्रोम भी कहा जाता है।