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दसलक्षण महापर्व का चौथा दिन : चित्त की मलिनता का मूल कारण लोभ और लालच
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कोरोना संक्रमण के कारण दिगंबर जैन समाज का दसलक्षण पर्व पूरी तरह ऑनलाइन हो गया है। बुधवार को शहर के दिगंबर जैन मंदिरों में पर्युषण पर्व के चौथे दिन तीर्थंकरों का पूजन और अभिषेक संपन्न हुआ। बुधवार भाद्र पद शुक्ला अष्टमी पर जैन धर्म के नौवें तीर्थंकर 1008 पुष्पदंत भगवान के मोक्ष कल्याणक पर मंदिरों में विशेष पूजन किया गया। पर्व के पुनीत अवसर पर सायंकाल पं. सिद्धांत शास्त्री सांगानेर ने फेसबुक पर लाइव व्याख्यान करते हुए उत्तम शौच धर्म के बारे में जानकारी दी।
उन्होंने कहा कि ध्यान रखना सरलता की अनुपस्थिति में शुचिता संभव नहीं है। शुचिता का सबसे बड़ा शत्रु है लोभ, लिप्सा। लोभ को पाप का बाप कहा गया है। चित्त की मलिनता का मूल कारण लोभ और लालच है। जो मायावी है उनसे धर्म आराधना कभी नहीं हो सकती है। वह धर्म भी करता है तो लोभ से करता है। प्रत्येक आत्मा में निर्मल होने की शक्ति है। आज हमारे मन में, वचन में, काया में इतनी अपवित्रता आ गई है कि उसे पवित्र करना मुश्किल है।
उन्होंने कहा कि उत्तम शौच लोभ परिहारी, संतोषी गुण रतन भंडारी...। जिस व्यक्ति ने अपने को निर्लोभी बना लिया है, संतोष धारण कर लिया है, उसका जीवन परम शांति को उपलब्ध हो जाता है। शाम को तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी, क्षेत्रपाल बाबा एवं देवी पद्मावती जी की आरती मंदिरों में संपन्न हुई।
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उन्होंने कहा कि ध्यान रखना सरलता की अनुपस्थिति में शुचिता संभव नहीं है। शुचिता का सबसे बड़ा शत्रु है लोभ, लिप्सा। लोभ को पाप का बाप कहा गया है। चित्त की मलिनता का मूल कारण लोभ और लालच है। जो मायावी है उनसे धर्म आराधना कभी नहीं हो सकती है। वह धर्म भी करता है तो लोभ से करता है। प्रत्येक आत्मा में निर्मल होने की शक्ति है। आज हमारे मन में, वचन में, काया में इतनी अपवित्रता आ गई है कि उसे पवित्र करना मुश्किल है।
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उन्होंने कहा कि उत्तम शौच लोभ परिहारी, संतोषी गुण रतन भंडारी...। जिस व्यक्ति ने अपने को निर्लोभी बना लिया है, संतोष धारण कर लिया है, उसका जीवन परम शांति को उपलब्ध हो जाता है। शाम को तीर्थंकर पार्श्वनाथ जी, क्षेत्रपाल बाबा एवं देवी पद्मावती जी की आरती मंदिरों में संपन्न हुई।
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