वाराणसी के जेल बन गए ‘यातना शिविर’
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फतेहगढ़ जेल में रविवार को सात घंटे तक बवाल हुआ। बीते साल दो अप्रैल को वाराणसी जिला कारागार में भी साढ़े सात घंटे तक ऐसा ही उपद्रव हुआ था। इसके बावजूद जेलों की स्थिति सुधारने के लिए शासन स्तर से गंभीरता से प्रयास नहीं किए जा रहे हैं।
हाल यह है कि वाराणसी की सेंट्रल और जिला जेल में निर्धारित क्षमता से दो से ढाई गुना ज्यादा बंदी निरुद्ध हैं। नतीजतन पीने के पानी, शौचालय, स्वास्थ्य और सफाई सहित अन्य सुविधाओं का बुरा हाल है। जेल यातना शिविर में तब्दील होते जा रहे हैं।
सेंट्रल जेल की क्षमता 990 कैदियों की है लेकिन यहां की 27 एक मंजिला और दो दोमंजिला बैरक में 1711 सजायाफ्ता कैदी रखे गए हैं। जिला जेल की निर्धारित क्षमता 747 बंदियों की है लेकिन यहां की 18 बैरकों में 1852 विचाराधीन बंदी निरुद्ध हैं। पेयजल की सुचारु व्यवस्था के लिए सेंट्रल जेल को 10 हैंडपंप की दरकार है।
सेंट्रल जेल के 1711 कैदियों की देखभाल के लिए महज दो डॉक्टर और एक पैरामेडिकल स्टाफ है। इसी तरह जिला कारागार के 1852 बंदियों के लिए दो डॉक्टर और एक पैरामेडिकल स्टाफ है। इस संख्या से ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जेलों में स्वास्थ्य सुविधा का क्या हाल होगा।
दोनों जेलों में औसतन 20 से 25 बंदियों के बीच एक टॉयलेट है जो रोजाना सुबह मारामारी का कारण बनता है। जेल अधिकारी ही कहते हैं कि औसतन सात बंदियों पर एक टॉयलेट होना चाहिए। इसके साथ ही बैरकों की साफ-सफाई की स्थिति भी बदतर है।
‘पैसा है तो जेल के भीतर कुछ भी संभव है’
सेंट्रल जेल में चार पैरामेडिकल स्टाफ की जगह एक, दो जेलर की जगह एक, 12 डिप्टी जेलर की जगह एक और 135 बंदीरक्षक तैनात हैं। कैदियों की बढ़ती संख्या देख 135 बंदीरक्षकों की और मांग की गई है। इसी तरह जिला जेल में एक जेलर, छह डिप्टी जेलर की जगह चार और 80 बंदीरक्षक तैनात हैं।
जिला कारागार को भी 80 बंदीरक्षक और चाहिए। जेल पुलिस को असलहे चलाने का प्रशिक्षण कभी नहीं दिया जाता और असलहे के तौर पर चलन से बाहर हो चुकी थ्री नॉट थ्री रायफल थमाई जाती है। इसी व्यवस्था के बीच सेंट्रल जेल में चार पाकिस्तानी और तीन नक्सली भी कैद हैं।
जिला कारागार में पिछले साल दो अप्रैल का उपद्रव रहा हो या फतेहगढ़ कारागार में रविवार को हुआ बवाल, दोनों की जड़ में एक ही कारण सामने आया जेल में पैसे का खेल...। बाहर आए बंदी बताते हैं कि परिवारीजनों से मुलाकात, पेशी, बैरक में रहने, खाने-पीने के सामान और अस्पताल में भर्ती होने के लिए रुपये देने का दम हो तो जेल में कुछ भी संभव है।
सभी प्रकार की सुविधाएं आसानी से मिल जाती हैं। जेल से बाहर आए बंदियों के अनुसार मुलाकात के लिए बंदीरक्षक को 30 रुपये देने पड़ते हैं और मुलाकाती को भी 20 से 50 रुपये खर्च करना पड़ता है।
वहीं, मनमाफिक बैरक में रहने या शिफ्ट होने के लिए पांच-सात हजार रुपये से लेकर बंदी की हैसियत देखकर मांग की जाती है। बंदी को सिगरेट, तंबाकू, गुटका और बीड़ी देने के लिए मुलाकाती को बंदीरक्षकों को खुश करना पड़ता है। बंदीरक्षक भी निर्धारित कीमत से तीन से चार गुना अधिक पैसे लेकर नशे के सामान बंदियों-कैदियों को मुहैया कराते हैं।