झुग्गी-झोपड़ी के बीच गली क्रिकेट खेलने वाली टी-20 में खेलेगी राधा, लड़कों संग खेलने पर देते थे ताना
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बचपन में लड़कों के साथ गली क्रिकेट खेलने वाली लड़की अब आस्ट्रेलिया में देश को लिए टी-20 वर्ल्ड कप खेलेगी। लड़कों की टीम में खेलने पर जो लोग उसे ताने मारते थे, आज उन्हीं की जुबां बिटिया की सराहना करते नहीं थक रहे। राधा यादव की सफलता ने उन हजारों लड़कियों के आंखों में उम्मीद की नई किरण जगाई है, जो साधन, सहयोग और प्रोत्साहन के बिना अपनी प्रतिभा को दबा देती हैं।
मूल रूप से जौनपुर के अगोशी गांव निवासी ओमप्रकाश यादव की बेटी राधा यादव के झुग्गी झोपडिय़ों के बीच गली क्रिकेट से निकलकर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट के लिए भारतीय टीम का हिस्सा बनने की कहानी काफी दिलचस्प और संघर्षपूर्ण है। महज छह वर्ष की उम्र में ही राधा ने क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था। पहले वह मोहल्ले के ही बच्चों के साथ खेलती थी।
आंखों में नीली जर्सी पहनने का ख्वाब संजोए राधा को यह भी नहीं पता था कि क्रिकेट में महिलाओं की टीम अलग है। गली में स्टंप लगाकर लड़कों के साथ एकमात्र लड़की को खेलते देख आसपास के लोग परिवार पर तंज कसते थे। मुंबई के कांदीवली पश्चिम के महावीर नगर में जनरल स्टोर की छोटी सी दुकान चलाने वाले पिता ओमप्रकाश बताते हैं कि उन्हें अक्सर यह सुनने को मिलता था कि बेटी को इतनी छूट ठीक नहीं।
लड़के कुछ बोल दें या मारपीट कर दें तो दिक्कत हो जाएगी। मगर उन्होंने कभी भी इसकी परवाह नहीं की। बेटी को खुलकर अपनी मर्जी से खेलने की हमेशा छूट दी। यही कारण है कि आज वह इस मुकाम पर पहुंची है कि दूसरे उसकी नजीर दे सकें। शुरुआती दिनों को याद करते हुए पिता बताते हैं कि खेल के दौरान राधा कई बार गिरी, चोटहिल हुई, मैदान में ही बेहोश हो गई, बावजूद खेल से मुंह नहीं मोड़ा। कई बार तो बुखार के दौरान भी वह मैच खेलने और प्रैक्टिस के लिए पहुंच जाती थी। पड़ोस में रहने वाले कोच प्रफुल्ल पाटिल ने राधा की प्रतिभा को पहचाना और उसे निखारा।
बैट खरीदने को नहीं थे पैसे, लकड़ी से खेलती थीं
चार भाई-बहनों में सबसे छोटी राधा के पिता ओमप्रकाश यादव जनरल स्टोर की छोटी सी दुकान चलाते हैं। छोटी सी दुकान से मुंबई जैसे महानगर में जीविकोपार्जन बेहद मुश्किल रहा है। पढ़ाई-दवाई का खर्चा भी बमुश्किल निकल पाता है। ऊपर से बार-बार म्यूनिसिपल कार्पोरेशन की ओर से अतिक्रमण के नाम पर दुकानें हटाने की आशंका बनी रहती थी।
ऐसी विपरीत परिस्थितियों में राधा के पास किट तो दूर बैट खरीदने के पैसे नहीं थे। तब वह लकड़ी को बैट बनाकर अभ्यास करती थी। घर से तीन किमी दूर राजेंद्रनगर में मौजूद स्टेडियम तक पिता साइकिल से उसे छोडने जाते और फिर दूसरी ओर से राधा टेंपो तो कभी पैदल ही घर आती थी। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद न तो पिता ने हार माना और न ही बेटी ने हौसला छोड़ा।
शिखा के चयन से गांव में छाई खुशी
टी-20 वर्ल्ड कप के लिए भारतीय टीम में शिखा पांडेय के चयन से पूरे गांव में खुशी का माहौल है। लोग एक-दूसरे को बधाई दे रहे हैं। शिखा के पिता सुभाष पांडेय मचहटी गांव के निवासी हैं। सुभाष गोवा में जहां केंद्रीय विद्यालय में अध्यापक हैं, वहीं दूसरे भाई जमुना पांडेय जबलपुर में अध्यापक हैं। शिखा का परिवार लंबे समय से गोवा में ही है। घर पर उनका आना-जाना काफी कम है। परिवार के नरेंद्र पांडेय ने बताया कि शिखा के चयन से जहां घर परिवार गांव का नाम रोशन हुआ है, वहीं वह प्रदेश व देश का नाम रोशन करेगी।शिखा पर पूरे परिवार को गर्व है।