राष्ट्रपति से सम्मानित प्रिंसिपल की पिटाई पर 28 साल बाद फैसला, थानेदार सहित पांच को सात साल की सजा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
गाजीपुर में राष्ट्रपति से सम्मानित अवकाश प्राप्त प्रधानाचार्य की बर्बर पिटाई मामले में 28 साल बाद फैसला आया है। अपर सत्र न्यायाधीश फास्ट ट्रैक कोर्ट प्रथम दुर्गेश ने मरदह थाने के तत्कालीन थानाध्यक्ष एमए काजी सहित पांच अभियुक्तों को सात-सात वर्ष के सश्रम कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाई। अर्थदंड की आधी राशि वादी कुबेरनाथ के पुत्र प्रो. हरिकेश सिंह को देने का निर्देश दिया है।
अभियोजन के अनुसार मरदह थाना क्षेत्र के घरिहां गांव में अप्रैल 1991 में मरदह के तत्कालीन थानाध्यक्ष मंसूर अहमद काजी, सब इंसपेक्टर तथा कुछ पुलिस कर्मियों के साथ दो पक्षों के बीच हुए जमीन विवाद में गए थे। वे गालियां दे रहे थे जिसका विरोध राष्ट्रपति से पुरस्कृत रिटायर्ड प्रिंसिपल कुबेरनाथ सिंह ने किया। इस पर पारसनाथ सिंह आदि के साथ थानाध्यक्ष एमए काजी सहित पुलिसकर्मी उन्हें जीप में बैठाकर थाने ले गए।
रास्ते में उनकी पिटाई भी की जिससे उनका हाथ भी टूट गया। इस संबंध में कुबेरनाथ सिंह ने जिला कोर्ट में याचिका दाखिल की और प्रदेश सरकार से गुहार लगाई। इस मामले कोर्ट ने सात सिपाहियों के खिलाफ केस दर्ज करने का आदेश दिया। इसी बीच कुबेरनाथ सिंह का निधन हो गया।
उसके बाद उनके पुत्र बीएचयू के एजुकेशन फैकल्टी के पूर्व डीन और जय प्रकाश विश्वविद्यालय छपरा बिहार के कुलपति हरिकेश सिंह ने शासन में इसकी शिकायत की। इस पर सीबीसीआईडी जांच हुई। जांच में दर्ज दोनों मामले गलत पाए गए जिस पर सीबीसीआईडी ने थानाध्यक्ष मरदह एमए काजी, पुलिस कर्मियों एवं घरिहां के पारसनाथ सिंह सहित 15 लोगों के विरुद्ध विभिन्न धाराओं मुकदमा पंजीकृत कराया।
आरोप पत्र न्यायालय में आने के बाद विचारण कर न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने 30 अक्तूबर 14 को सभी आरोपियों को दोष मुक्त कर दिया। बाद में हरिकेश सिंह की ओर से निर्णय के विरुद्ध सत्र न्यायाधीश की अदालत में अपील की गई थी।
अभियोजन पक्ष की ओर से अधिवक्ता संजय कुमार राय और बचाव पक्ष के अधिवक्ता को सुनने के बाद अपर सत्र न्यायाधीश फास्ट ट्रैक कोर्ट प्रथम की अदालत ने गुरुवार को सभी धाराओं में एमए काजी और कांस्टेबल श्याम नारायण सिंह को तथा घरिहां गांव के पारसनाथ सिंह, सुरेश सिंह और पीयूषकांत सिंह को दोषी माना। शुक्रवार को सजा के बिंदु पर सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि इस कृत्य से समाज में गलत संदेश गया है। अभियुक्तगण दया के पात्र नहीं हैं।
एमके काजी और श्यामनारायण सिंह को सात-सात वर्ष के सश्रम कारावास तथा दोनों को अलग-अलग एक लाख दो हजार के अर्थदंड की सजा सुनाई। वहीं घरिहां गांव के अभियुक्तों को सात-सात वर्ष के सश्रम कारावास के साथ ही प्रत्येक को पैंतीस-पैंतीस हजार का जुर्माना लगाया गया।