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Varanasi News: पुत्री से दुष्कर्म के प्रयास के आरोप से पिता दोषमुक्त, पांच वर्ष पहले थाने में दर्ज हुआ था केस
Wed, 28 Feb 2024 05:55 PM IST
अमन विश्वकर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Published by: अमन विश्वकर्मा
Updated Wed, 28 Feb 2024 05:55 PM IST
सार
Varanasi News: अदालत ने इस मामले में कहा है कि पीड़िता द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य से अभियुक्त के विरुद्ध लगा लैंगिक हमले का आरोप किसी भी प्रकार से साबित नहीं होता है। विचारण के दौरान अंकित साक्ष्य से ऐसे आधारभूत तथ्यों को अभियोजन पक्ष साबित नहीं कर सका है, जिसके आधार पर अभियुक्त द्वारा लैंगिक हमला करने की उपधारणा की जा सके।
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सांकेतिक तस्वीर।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
वाराणसी में पुत्री से दुष्कर्म के प्रयास और छेड़खानी के मामले में आरोपी पिता को कोर्ट से राहत मिल गई। विशेष न्यायाधीश द्वितीय (पॉक्सो एक्ट) अनुभव द्विवेदी की अदालत ने आरोप साबित नहीं होने पर पिता को दोषमुक्त कर दिया।
अदालत ने आदेश में कहा कि पीड़िता द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य से अभियुक्त के विरुद्ध लगा लैंगिक हमले का आरोप किसी भी प्रकार से साबित नहीं होता है। अभियोजन साक्षीगण के साक्ष्य से भी कथित अपराध के आधारभूत तथ्य साबित नहीं होते हैं।
विचारण के दौरान अंकित साक्ष्य से ऐसे आधारभूत तथ्यों को अभियोजन पक्ष साबित नहीं कर सका है, जिसके आधार पर अभियुक्त द्वारा लैंगिक हमला करने की उपधारणा की जा सके। जहां तक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के बयान के आधार पर विशेष लोक अभियोजन का तर्क है, न्यायालय उससे सहमत नहीं है।
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उच्चतम न्यायालय ने जॉर्ज व अन्य बनाम स्टेट ऑफ केरला व अन्य के केस में यह कहा था कि धारा 164 के तहत अंकित बयान को मौलिक (स्वतंत्र अथवा सारगर्भित) साक्ष्य के रूप में नहीं माना जा सकता।
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अदालत ने आदेश में कहा कि पीड़िता द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य से अभियुक्त के विरुद्ध लगा लैंगिक हमले का आरोप किसी भी प्रकार से साबित नहीं होता है। अभियोजन साक्षीगण के साक्ष्य से भी कथित अपराध के आधारभूत तथ्य साबित नहीं होते हैं।
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विचारण के दौरान अंकित साक्ष्य से ऐसे आधारभूत तथ्यों को अभियोजन पक्ष साबित नहीं कर सका है, जिसके आधार पर अभियुक्त द्वारा लैंगिक हमला करने की उपधारणा की जा सके। जहां तक दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के बयान के आधार पर विशेष लोक अभियोजन का तर्क है, न्यायालय उससे सहमत नहीं है।
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उच्चतम न्यायालय ने जॉर्ज व अन्य बनाम स्टेट ऑफ केरला व अन्य के केस में यह कहा था कि धारा 164 के तहत अंकित बयान को मौलिक (स्वतंत्र अथवा सारगर्भित) साक्ष्य के रूप में नहीं माना जा सकता।
बेटी ने मां को बताई थी यह कहानी
अभियोजन पक्ष के अनुसार पीड़िता ने लंका थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई थी। आरोप लगाया कि 24 अप्रैल 2017 की रात उसके पिता ने उसके साथ गलत काम किया। वह अपने मां के बगल में सोई थी और दूसरी तरफ उसके पिता सोये थे। वह वहां इसलिए सोई थी क्योंकि उसके बड़े पापा के बेटे घर पर आए थे और जगह की कमी थी। उसने तुरंत अपनी मां को सब कुछ बताया था।
मां ने उसकी बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया था। ऐसी घटना उसके साथ लगभग डेढ़ साल पहले भी हुई थी। जब 24 अप्रैल 2017 को पिता ने दोबारा यौन हिंसा करने की कोशिश की तो उसने उनके पैर पर मारा और उनके हाथ पर नोचने की कोशिश की। अभियोजन पक्ष की ओर से अभियुक्त पर लगे आरोप के समर्थन में सात मौखिक साक्षीगण के साक्ष्य और नौ अभिलेखीय साक्ष्य प्रस्तुत किया गया था।
मां ने उसकी बात को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया था। ऐसी घटना उसके साथ लगभग डेढ़ साल पहले भी हुई थी। जब 24 अप्रैल 2017 को पिता ने दोबारा यौन हिंसा करने की कोशिश की तो उसने उनके पैर पर मारा और उनके हाथ पर नोचने की कोशिश की। अभियोजन पक्ष की ओर से अभियुक्त पर लगे आरोप के समर्थन में सात मौखिक साक्षीगण के साक्ष्य और नौ अभिलेखीय साक्ष्य प्रस्तुत किया गया था।