बनारस में बनेगा देश का पहला मॉडल गंगा ग्राम, स्वरोजगार के साथ होंगी ये सुविधाएं
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वाराणसी में अविरल और निर्मल उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर स्थित गांवों को अर्थ गंगा से जोड़ने की तैयारी है। देश के पहले मॉडल गंगा ग्राम में गंगाजल को खेती, मत्स्य पालन और इको टूरिज्म में इस्तेमाल कर गंगा ब्रांड बाजार में उतारा जाएगा। महामना मालवीय शोध संस्थान बीएचयू के प्रस्ताव को नमामि गंगे ने स्वीकार कर लिया है। जल्द ही गांव का चयन का यह अभिनव प्रयोग शुरू किया जाएगा। यह देश का पहला मॉडल गंगा ग्राम काशी में बनेगा।
मॉडल गंगा ग्राम में गंगा जल के नान कंजंपटिव इस्तेमाल से कृषि, इको टूरिज्म, मछली पालन, पक्षी विहार और गंगाजल पर आधारित स्वरोजगार के साधन विकसित होंगे। गंगाजल की खेती से उत्पन्न होने वाली फसलें गंगा का नया ब्रांड होंगी। गंगा के किनारे मॉडल गंगा ग्राम में उगने वाली फसलें गंगा जल से सिंचाई कर तैयार की जाएंगी और शुद्ध तरीके से आर्गेनिक सब्जियों की अच्छी कीमत बाजार से मिलने की उम्मीद है।
इनके गंगा लौकी, गंगा गोभी जैसे नाम भी दिए जाएंगे। ऑर्गेनिक तरीके और गंगाजल से तैयार इन फसलों में पौष्टिकता भी भरपूर होगी। गंगाजल के नान कंजंपटिव प्रयोग से गंगा बेसिन में आर्थिक विकास का मॉडल पूरे देश के लिए नजीर होगा। इससे नए रोजगार के सृजन के साथ पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। काशी के बाद यह पूरे गंगा बेसिन में काशी की तर्ज पर गंगा ग्राम को विकसित किया जाएगा। गंगा ग्राम को धरातल पर उतारने के लिए शूलटंकेश्वर से गंगा वरुणा संगम तक गंगामित्रों ने सर्वे पूरा कर लिया है। नमामि गंगे ने भी योजना को धरातल पर उतारने की मंजूरी दे दी है।
नदी वैज्ञानिक और शोथ संस्थान के अध्यक्ष प्रो. बीडी त्रिपाठी ने बताया कि गंगा ग्राम मॉडल पूरे देश के लिए एक नजीर बनेगा। गंगा ग्राम मॉडल में गंगाजल के नान कंजंपटिव इस्तेमाल के जरिए आर्थिक विकास की नई योजना तैयार की गई है। नमामि गंगे के डायरेक्टर जनरल राजीव रंजन मिश्र से इस मामले मे बातचीत हो चुकी है।
शूलटंकेश्वर से गंगा वरुणा संगम तक हुआ है सर्वे
महामना मालवीय गंगा शोध संस्थान की ओर सौ गंगा मित्रों ने शूलटंकेश्वर से गंगा वरुणा संगम तक सर्वे किया था। इसमें 20-20 की पांच टीम बनाकर गंगामित्रों की टीम ने 10 दिनों तक आर्थिक सर्वे किया था। सर्वे के रिपोर्ट के आधार पर ही नमामि गंगे ने मॉडल ग्राम योजना पर स्वीकृति दी है।
नहीं होगी गंगाजल की बर्बादी
नदी वैज्ञानिक प्रो. बीडी त्रिपाठी ने बताया कि गंगा जल के नान कंजंपटिव इस्तेमाल में गंगाजल का प्रयोग तो होता है लेकिन जल की बर्बादी नहीं होती है। माइक्रो इरिगेशन तकनीक के जरिए खेती में केवल 15 फीसदी पानी बर्बाद होता है और 85 फीसदी पानी की बचत।