बनारसी चाय की अड़ियों ने कई आंदोलनों की रखी नींव, मानी जाती हैं राजनीति का केंद्र
वाराणसी की यह अड़ियां प्रदेश के साथ पूरे देश में मशहूर हैं। इन अड़ियों में बैठकर लोग राजनीति से लेकर आंदोलन की बात करते हैं। कई आंदोलनों की शुरुआत यहीं से हुई है।
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हर साल 21 मई को अंतराष्ट्रीय चाय दिवस के रूप में मनाया जाता है। वैसे तो चाय के शौकीन लोग विश्वभर में हैं। लेकिन बनारसी चाय की बात आते ही लोगों की जुबान पर यहां की मशहूर अड़ियों का जिक्र करना स्वाभाविक है। यहां की अड़ियों पर चाय की प्याली तूफान खड़ा करने का काम करती आई हैं। बनारसियों को किसी और जगह जाने की जरूरत नहीं, इन्ही अड़ियों पर उन्हें शांति और सुकून मिलता है। इन अड़ियों पर बैठे लोग घंटों चर्चा करते-करते सरकारें तक बदल डालते थे।
अस्सी पर पप्पू की अड़ी, लंका पर टंडन की अड़ी जहां विद्यार्थी नेता चाय पिया करते थे। गोदौलिया पर दी रेस्टोरेंट, चौक के पास लक्ष्मी चाय वाले और लहुराबीर पर मोती कैंटीन कई दशकों तक बनारसी चाय की अड़ियों के नाम से मशहूर रहीं। जहां स्थानीय ही नही बल्कि प्रदेश भर के नामचीन नेता और हस्तियां बैठकर बनारसी चाय का लुफ्त उठते थें। साथ ही देश की राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर चर्चा किया करते थे। इन अड़ियों पर पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर, पूर्व रेल मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस, वर्तमान रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वर्तमान राज्यपाल कलराज मिश्रा, किसानों के नेता चौधरी अजित सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह व कई बड़े लेता चाय की चुस्की पर राजनीतिक चर्चा के साथ स्थानीय लोगों से भी बातचीत किया करते थें।
उन दिनों बनारस को करीब से देखने और जानने वाले भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अशोक कुमार पांडेय बताते हैं कि इन अड़ियों पर ओबामा हों, ओसामा हों, दलाईलामा हों, वास्कोडिगामा हों या किसी के मामा हों चाय की चुस्की लेने के साथ यहां बनारसी बैठकर दुनिया के किसी भी हस्ती पर घंटों चर्चा किया करते थे। इन्हीं चाय की अड़ियों से पूरे प्रदेश में आंदोलन कर नेताओं ने तूफान खड़ाकर दिया था।
1980 में काशी विश्वनाथ मंदिर से सोना चोरी होने के मामले में इन्हीं अड़ियों से आंदोलन की शुरुआत हुई। जिसमें वर्तमान चंदौली जिले के चकिया क्षेत्र से सोना बरामद किया गया। यही वो समय था, जब काशी विश्वनाथ मंदिर परिक्षेत्र को सरकार ने अपने अधिग्रहण में ले लिया। ऐसी ही एक घटना 1883 हुई, जिसमें एक रिक्शा चालक मुन्नूलाल की हत्या का मामला उठा और इन चाय की अड़ियों से आंदोलन की शुरुआत हुई। जिसने प्रदेश भर को हिला कर रख दिया।
गोदौलिया चौराहे पर आंदोलन कर रहे पूर्व भाजपा विधायक श्यामदेव राय चौधरी पर प्रशासन ने लाठीचार्ज किया। जिसमें वह बुरी तरह घायल हो गए। साथ ही लखनऊ में आंदोलन के दौरान एक पुलिस अधिकारी की भी मृत्यु हो गई। ऐसे ही इन चाय की अड़ियों से कई तूफानी आंदोलनों को खड़ा किया गया। जिसमें जय प्रकाश नारायण और बीपी सिंह का आंदोलन प्रमुख है। जिसमें इन्ही अड़ियों से नारा दिया गया राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है। दुर्भाग्य है कि एक सुलझी राजनीति और समाज के लिए कुछ कर गुजरने वाले लोगों की यह अड़ियां समाप्त होती जा रही हैं। आज के युवाओं में वह बात भी नहीं रह गई।