ट्रॉमा सेंटर में गलत सर्जरी का मामला: सुनवाई में न साक्ष्य मांगे, न किए कोई सवाल, कैसी हो रही है जांच; सवाल
Varanasi News: ट्रॉमा सेंटर के न्यूरो सर्जरी विभाग में स्पाइन कॉर्ड ट्यूमर से ग्रसित बलिया निवासी राधिका देवी (71) को प्रो. अनुराग साहू की देखरेख में 25 फरवरी को वार्ड के बेड नंबर 29 पर भर्ती कराया गया था। इस बीच 7 मार्च को आर्थोपेडिक्स विभाग में प्रो. अमित रस्तोगी के निर्देशन में टीम ने राधिका देवी की जांघ की सर्जरी शुरू कर दी।
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Varanasi News: काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के ट्रॉमा सेंटर में महिला की कथित गलत सर्जरी और मौत के मामले की जांच पर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। शिकायतकर्ता मृत्युंजय पाल ने जांच प्रक्रिया को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि गठित जांच कमेटी की कार्यप्रणाली से उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद कम दिख रही है।
मृत्युंजय पाल के अनुसार, जांच कमेटी ने उन्हें मंगलवार को अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया था, लेकिन सुनवाई के दौरान न तो उनसे कोई साक्ष्य मांगा गया और न ही कोई सवाल किया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि बिना तथ्यों और साक्ष्यों के जांच कैसे पूरी होगी। इसको लेकर उन्होंने बृहस्पतिवार को सीएम पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराते हुए जांच की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया है।
कार्रवाई की मांग
मामला ट्रॉमा सेंटर के न्यूरो सर्जरी विभाग से जुड़ा है, जहां बलिया निवासी 71 वर्षीय राधिका देवी को स्पाइन कॉर्ड ट्यूमर के इलाज के लिए 25 फरवरी को भर्ती कराया गया था। वह प्रो. अनुराग साहू की देखरेख में वार्ड के बेड नंबर 29 पर भर्ती थीं। आरोप है कि 7 मार्च को आर्थोपेडिक्स विभाग की टीम ने, प्रो. अमित रस्तोगी के निर्देशन में, उनकी जांघ की सर्जरी शुरू कर दी, जबकि जांघ में कोई समस्या नहीं थी। सर्जरी के दौरान जब हड्डी सामान्य पाई गई तो डॉक्टर भी हैरान रह गए।
इसके बाद 18 मार्च को न्यूरोसर्जरी टीम ने स्पाइन की सर्जरी की, लेकिन इलाज के दौरान 27 मार्च को राधिका देवी की मौत हो गई। घटना के बाद मृतका के पोते मृत्युंजय पाल ने 1 अप्रैल को आईएमएस के निदेशक और कुलपति से शिकायत कर कार्रवाई की मांग की थी।
मृत्युंजय का आरोप है कि प्रारंभिक जांच कमेटी में प्रो. अमित रस्तोगी को ही अध्यक्ष बना दिया गया था, जबकि उन्हीं की टीम पर गलत सर्जरी का आरोप है। बाद में विरोध के बाद प्रो. अजीत सिंह की अध्यक्षता में नई कमेटी गठित की गई। इस कमेटी ने 21 अप्रैल को उनका पक्ष सुना, लेकिन प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि जांच इसी तरह औपचारिकता बनकर रह गई, तो पीड़ित परिवार को न्याय मिलना मुश्किल होगा।