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माता-पिता के आदर्शों पर चलकर सींचेंगे संस्कारों का वट वृक्ष
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माता-पिता के संस्कार बच्चों में जीवन भर रहते हैं। वह रहें या ना रहें, लेकिन संस्कारों की शृंखला अनवरत जारी रहती है। माता-पिता की प्रेरणा से बच्चे आज भी उनके बताए रास्ते पर चल रहे हैं। पितृपक्ष पुरखों को नमन करने का अवसर देता है और संस्कारों के वट वृक्ष को सींचने का भी।
जीवन भर साथ हैं मां-पिता के आदर्श
माता-पिता भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके आदर्श हमारे साथ जीवन भर रहते हैं। उन्हें याद करने का कोई एक दिन नहीं बल्कि हमारे लिए हर दिन पितृ विसर्जन जैसा रहता है। सुबह कॉलेज के लिए घर से निकलने से पहले माता-पिता की प्रतिमा के समक्ष खड़े होकर आशीर्वाद लेकर ही कदम बढ़ाते हैं। हर साल मातृ नवमी के दिन जीवित्पुत्रिका का व्रत पड़ता है। इस दिन मां को याद कर जरूरतमंदों को भी भोजन खिलाते हैं। जूनियर हाईस्कूल में शिक्षक रहे पिता धर्मदेव सिंह भी हमेशा सकारात्मक सोच, कड़ी मेहनत के साथ आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देते रहते थे। जिला स्वास्थ्य निरीक्षक रही माता रामरती देवी के बताए आदर्शों का अनुसरण जीवन भर करते रहेंगे।
- डॉ. प्रतिभा यादव, प्रधानाचार्य, आर्य महिला इंटर कॉलेज
पिता ने डरना नहीं डटकर आगे बढ़ना सिखाया
पिता स्व. रवींद्र पांडेय ने कभी भी संघर्षों से डरना नहीं, बल्कि रास्ते पर डटकर चलना और सफलता हासिल करना सिखाया है। वह उन व्यक्तियों में शामिल थे, जिन्होंने मुझे सफल इंसान और शिक्षित नागरिक बनाया। पितृ पक्ष पितरों को याद करने का पर्व है। वह हमेशा हमारे साथ रहते हैं। तभी तो हम अपने जीवन में आगे बढ़ते हैं। मुझे भी हर पल यह अहसास होता है कि पिता साथ हैं। वह मुझे कहीं ना कहीं संबल प्रदान कर रहे हैं। सभी को समझना चाहिए कि हमारे माता-पिता भले ही भौतिक रूप से साथ हो न हो, मानसिक रूप से वह साथ हैं। आज जो हूं पिता की वजह से हूं और उनके द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलकर समाज में कुछ कर पा रही हूं।
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- डॉ. स्वाति एस मिश्रा, असिस्टेंट प्रोफेसर समाजशास्त्र, आर्य महिला पीजी कालेज
पापा मेरे जीवन आदर्श
पापा मेरे आदर्श रहे। उन्हें बचपन से कठिन परिश्रम करते देखा। ताकि हम अच्छी जिंदगी जी सके। आज उन्हीं के आदर्शों का पालन अपने जीवन में करती हूं। जब भी मन दुखी होता है, उन्हें दिल से याद करती हूं तो उनका स्पर्श सिर पर महसूस करती हूं। पापा आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनका हिम्मत, हौसला आज भी हमारे दिल में है। इस साल पिता की सातवीं पुण्यतिथि है। लोग कहते हैं कि बेटी ही मां बाप का नाम रोशन करती है, पर मैं नहीं मानती। पापा के नाम से ही बीआर फाउंडेशन संस्था की स्थापना की। बचपन से हमेशा दूसरों की मदद करने की सीख दी है। वह कहते थे कि जो भी करो दिल से करो और वो काम करो जिसमें तुम्हें खुशी मिले। पापा की दी हुई सीख को अपनाकर आज मैं बच्चों व महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास कर रही हूं।
पूनम राय, चित्रकार
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जीवन भर साथ हैं मां-पिता के आदर्श
माता-पिता भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके आदर्श हमारे साथ जीवन भर रहते हैं। उन्हें याद करने का कोई एक दिन नहीं बल्कि हमारे लिए हर दिन पितृ विसर्जन जैसा रहता है। सुबह कॉलेज के लिए घर से निकलने से पहले माता-पिता की प्रतिमा के समक्ष खड़े होकर आशीर्वाद लेकर ही कदम बढ़ाते हैं। हर साल मातृ नवमी के दिन जीवित्पुत्रिका का व्रत पड़ता है। इस दिन मां को याद कर जरूरतमंदों को भी भोजन खिलाते हैं। जूनियर हाईस्कूल में शिक्षक रहे पिता धर्मदेव सिंह भी हमेशा सकारात्मक सोच, कड़ी मेहनत के साथ आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देते रहते थे। जिला स्वास्थ्य निरीक्षक रही माता रामरती देवी के बताए आदर्शों का अनुसरण जीवन भर करते रहेंगे।
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- डॉ. प्रतिभा यादव, प्रधानाचार्य, आर्य महिला इंटर कॉलेज
पिता ने डरना नहीं डटकर आगे बढ़ना सिखाया
पिता स्व. रवींद्र पांडेय ने कभी भी संघर्षों से डरना नहीं, बल्कि रास्ते पर डटकर चलना और सफलता हासिल करना सिखाया है। वह उन व्यक्तियों में शामिल थे, जिन्होंने मुझे सफल इंसान और शिक्षित नागरिक बनाया। पितृ पक्ष पितरों को याद करने का पर्व है। वह हमेशा हमारे साथ रहते हैं। तभी तो हम अपने जीवन में आगे बढ़ते हैं। मुझे भी हर पल यह अहसास होता है कि पिता साथ हैं। वह मुझे कहीं ना कहीं संबल प्रदान कर रहे हैं। सभी को समझना चाहिए कि हमारे माता-पिता भले ही भौतिक रूप से साथ हो न हो, मानसिक रूप से वह साथ हैं। आज जो हूं पिता की वजह से हूं और उनके द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलकर समाज में कुछ कर पा रही हूं।
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- डॉ. स्वाति एस मिश्रा, असिस्टेंट प्रोफेसर समाजशास्त्र, आर्य महिला पीजी कालेज
पापा मेरे जीवन आदर्श
पापा मेरे आदर्श रहे। उन्हें बचपन से कठिन परिश्रम करते देखा। ताकि हम अच्छी जिंदगी जी सके। आज उन्हीं के आदर्शों का पालन अपने जीवन में करती हूं। जब भी मन दुखी होता है, उन्हें दिल से याद करती हूं तो उनका स्पर्श सिर पर महसूस करती हूं। पापा आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनका हिम्मत, हौसला आज भी हमारे दिल में है। इस साल पिता की सातवीं पुण्यतिथि है। लोग कहते हैं कि बेटी ही मां बाप का नाम रोशन करती है, पर मैं नहीं मानती। पापा के नाम से ही बीआर फाउंडेशन संस्था की स्थापना की। बचपन से हमेशा दूसरों की मदद करने की सीख दी है। वह कहते थे कि जो भी करो दिल से करो और वो काम करो जिसमें तुम्हें खुशी मिले। पापा की दी हुई सीख को अपनाकर आज मैं बच्चों व महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास कर रही हूं।
पूनम राय, चित्रकार