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बुढ़वा मंगल के जलोत्सव को बनाएंगे विश्व धरोहर
अमर उजाला ब्यूरो, वाराणसी
Updated Mon, 09 Mar 2015 02:03 AM IST
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वाराणसी। गंगा की लहरों के बीच नावों-बजरों पर सजने वाली संगीत की महफिल ‘बुढ़वा मंगल’ को विश्व धरोहर की सूची में शामिल कराने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। बुढ़वा मंगल की पुरानी महफिलों से जुड़े यादगार चित्रों, गायन शैलियों, बनारसी मिजाज से जुड़ी पारंपरिक वेशभूषा और राजसी ठाठबाट के भावों का दस्तावेजीकरण करा लिया गया है। डाक्यूमेंट्री भी तैयार कराई जाएगी। संस्कृति विभाग की ओर से 31 मार्च तक इन दस्तावेजों को यूनेस्को भेजा जाएगा, ताकि इसे विश्व धरोहर की अमूर्त सूची में शामिल कराया जा सके। काशी के इस सबसे बड़े जल उत्सव की शुरुआत मीर रुस्तम अली ने 1735 में की थी।
होली के बाद पहले मंगलवार को होने वाले इस उत्सव को विश्व धरोहर की सूची में शामिल कराने के लिए पुराने चित्रों, संगीत की चर्चित महफिलों, गायिकाओं और राजाओं के बजरों से जुड़े तथ्यों का सहारा लिया जाएगा। आयोजन की विशेषता और आकर्षण को ध्यान में रखकर रिकार्ड तैयार किया गया है। सांस्कृतिक केंद्र प्रमुख डॉ. रत्नेश वर्मा ने इसकी पुष्टि की। चुन्नटदार कुर्ता, पायजामा, दुपलिया टोपी पहने लोग अब भी इस उत्सव का हिस्सा बनते हैं। बजरे पर ठंडई छनती है। भारतेंदु हरिश्चंद ने इस जलोत्सव के
बारे में लिखा है कि ‘बुढ़वा मंगल’ के दिन फूल-पत्तियों से सजी-धजी नावों पर सफेद चंदवा तनता था। मशालें जलती थीं। लाल-नीली मेहताबी रोशनी से संगीत की महफिलें गुलजार होती थीं। तब रामनगर के राजा सोनमुखी या मोरपंखी वाले बजरे पर निकलते थे। उस बजरे पर उनकी मसहरी खास आकर्षण का केंद्र होती थी। बड़ी मालवाहक नाव (‘पटेला’) के साथ छोटी नौकाएं जुड़ जाती थीं और एक समूह बनता था, जिसे झूमड़ कहा जाता था। कई पटेले एक में जुड़ जाते थे तब उस समूह को ‘किच्छा’ कहा जाता था। दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता के रईस इसमें शामिल होते थे। संगीत की महफिलें रात भर चलती थीं। रात भर ध्रुपद, धमार, ख्याल के अलावा ठुमरी, चैती गाई जाती थी।
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बुढ़वा मंगल की महफिल की सरताज गायिकाएं
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सरस्वती बाई, विद्याधरी, हुस्ना बाई, बड़ी मैना, छोटी मैना, मोती बाई, राजेश्वरी बाई, तोखी बाई, छोटी मोती, टामी बाई की गायकी की टीपों के किस्से अब भी बुजुर्गों की जुबान पर आ जाते हैं।
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होली के बाद पहले मंगलवार को होने वाले इस उत्सव को विश्व धरोहर की सूची में शामिल कराने के लिए पुराने चित्रों, संगीत की चर्चित महफिलों, गायिकाओं और राजाओं के बजरों से जुड़े तथ्यों का सहारा लिया जाएगा। आयोजन की विशेषता और आकर्षण को ध्यान में रखकर रिकार्ड तैयार किया गया है। सांस्कृतिक केंद्र प्रमुख डॉ. रत्नेश वर्मा ने इसकी पुष्टि की। चुन्नटदार कुर्ता, पायजामा, दुपलिया टोपी पहने लोग अब भी इस उत्सव का हिस्सा बनते हैं। बजरे पर ठंडई छनती है। भारतेंदु हरिश्चंद ने इस जलोत्सव के
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बारे में लिखा है कि ‘बुढ़वा मंगल’ के दिन फूल-पत्तियों से सजी-धजी नावों पर सफेद चंदवा तनता था। मशालें जलती थीं। लाल-नीली मेहताबी रोशनी से संगीत की महफिलें गुलजार होती थीं। तब रामनगर के राजा सोनमुखी या मोरपंखी वाले बजरे पर निकलते थे। उस बजरे पर उनकी मसहरी खास आकर्षण का केंद्र होती थी। बड़ी मालवाहक नाव (‘पटेला’) के साथ छोटी नौकाएं जुड़ जाती थीं और एक समूह बनता था, जिसे झूमड़ कहा जाता था। कई पटेले एक में जुड़ जाते थे तब उस समूह को ‘किच्छा’ कहा जाता था। दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता के रईस इसमें शामिल होते थे। संगीत की महफिलें रात भर चलती थीं। रात भर ध्रुपद, धमार, ख्याल के अलावा ठुमरी, चैती गाई जाती थी।
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सरस्वती बाई, विद्याधरी, हुस्ना बाई, बड़ी मैना, छोटी मैना, मोती बाई, राजेश्वरी बाई, तोखी बाई, छोटी मोती, टामी बाई की गायकी की टीपों के किस्से अब भी बुजुर्गों की जुबान पर आ जाते हैं।