BHU: बीएचयू तैयार करेगा खगोलीय घटनाओं का डेटाबेस, एक करोड़ से बनेगी वेधशाला; भविष्यवाणी की बढ़ेगी सटीकता
Varanasi News: बीएचयू के उन्नत अंतः विषयक अनुसंधान सुविधा (एआईआरएफ) योजना के तहत बीएचयू के ज्योतिषाचार्य और ज्योतिष विभागाध्यक्ष प्रो. शत्रुघ्न त्रिपाठी को दिया गया है।
विस्तार
बीएचयू में खगोलीय घटनाओं का डेटाबेस बनाने के लिए एक वेधशाला की स्थापना की जाएगी। ज्योतिष विद्या के छात्र-छात्राएं खगोल का गणतीय आकलन कर पंचांग तैयार करेंगे। इससे भविष्यवाणी की सटीकता बढ़ेगी। वहीं, देश भर में अलग-अलग दिनों पर मनाए जाने वाले त्योहारों में एकरूपता आएगी।
बीएचयू की ओर से इस प्रोजेक्ट के लिए एक करोड़ रुपये मंजूरी किए गए हैं। धनराशि खर्च करने की समय सीमा 31 मार्च है। इसे बीएचयू के उन्नत अंतः विषयक अनुसंधान सुविधा (एआईआरएफ) योजना के तहत बीएचयू के ज्योतिषाचार्य और ज्योतिष विभागाध्यक्ष प्रो. शत्रुघ्न त्रिपाठी को दिया गया है।
इसे भी पढ़ें; UP: काशी आ रहे भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, ढोल-नगाड़े के साथ 20 जगहों पर होगा स्वागत
ज्योतिष के प्रयोग हमेशा खुले आकाश में हों
परियोजना के प्रमुख प्रो. शत्रुघ्न त्रिपाठी ने बताया कि ज्योतिष ग्रंथों ने प्रायोगिक कार्यों को सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बताया है। कहा गया है कि ऐसे प्रयोग हमेशा खुले आकाश में किए जाते हैं। इन्हें आधुनिक यंत्रों और प्राचीन पारंपरिक छाया आदि मापक यंत्रों के द्वारा किया जाता रहा है। आधुनिक में टेलीस्कोप और तारामंडल हैं। वहीं पारंपरिक यंत्रों में ईंट, बालू और पत्थर सहित धातु के बने यंत्र हैं। जबकि यह सब परीक्षण एक जगह करना हो तो वेधशाला सबसे उपयुक्त होगा।
40 साल पहले बना था तारामंडपम
1982-85 में बीएचयू के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में प्रो. रामचंद्र पांडेय ने लौह यंत्रों की व्यवस्था कर संकाय के भवन के ऊपरी तल पर एक लघु तारामंडपम बनवाया था। लेकिन, वर्तमान में इसका इस्तेमाल न के बराबर है। कंप्यूटर, टेलीस्कोप और आधुनिक तारामंडल के आने से इसकी प्रासंगिकता बढ़ गई है। ऐसे में बीएचयू में अब लघु वेधशाला बनेगी।
छात्रों को होंगी ये सहूलियतें
- विभागीय छात्रों का प्रायोगिक अध्ययन से नए अवसरों और ज्ञान में बढ़ोतरी होगी।
- शोध छात्रों को नवाचार में मदद मिलेगी।
- गणितीय और प्रायोगिक अध्ययन से शास्त्रीय अंतर स्पष्ट हो सकेगा।
- खगोलीय परिवर्तन की जानकारी का एक डेटबेस तैयार होगा। इसका समय समय पर परीक्षण भी किया जाएगा।
- आपदा प्रबंधन में खगोलीय परिर्वतनों पर शोध संभव होगा।
- दूसरे विषयों के छात्र और छात्राओं को एनईपी के तहत शोध में मदद मिलेगी।