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भारतेंदु हरिश्चंद्र की पुण्यतिथिः पुस्तकों तक सिमटे आधुनिक हिंदी के जनक
Mon, 07 Jan 2019 10:30 AM IST
shashikant misra
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
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Published by: shashikant misra
Updated Mon, 07 Jan 2019 10:30 AM IST
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भारतेंदु हरिश्चंद्र
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काशी की तमाम विभूतियों में से एक भारतेंदु हरिश्चंद्र भी हैं, जो आधुनिक हिंदी के जनक कहे जाते हैं लेकिन वो आम जनमानस से अछूते हैं। इसका एक कारण उनके भवन और कृतियों का प्रचार-प्रसार न होना है तो दूसरा कारण उनके जन्मदिन और पुण्यतिथि पर होने वाली औपचारिकताएं हैं।
पुण्यतिथि छह जनवरी को मनाई जाती है, जो इस बार रविवार को थी, लेकिन वह केवल माल्यार्पण तक ही सिमट कर रह गई है। ऐसे में आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र कागजों और पुस्तकों में सिमट गए हैं।
पुरानी काशी के चौखंभा स्थित ठठेरी बाजार की गली में बना भारतेंदु भवन पहले चौखंभा स्कूल के नाम से जाना जाता रहा। वहां उन्होंने एक विद्यालय स्थापित किया। 1868 में विद्यालय भारतेंदु जी ने सूड़िया में स्थानांतरित किया और बाद में 1895 में मैदागिन पर विद्यालय बना, जो हरिश्चंद्र महाविद्यालय, हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज और कन्या कॉलेज खोला गया है।
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भारतेंदु हरिश्चंद्र के पौत्र दीपेश चौधरी ने बताया कि दादाजी के बारे में जितना हम लोगों ने सुना है, वह आश्चर्य लगता है। 5 वर्ष की अल्प आयु में ही दोहा लिखना। 35 साल में ही कई पत्रिकाओं व किताबों, नाटकों का रचनाकार बनना, अपने आप में अनोखी बात है।
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पुण्यतिथि छह जनवरी को मनाई जाती है, जो इस बार रविवार को थी, लेकिन वह केवल माल्यार्पण तक ही सिमट कर रह गई है। ऐसे में आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र कागजों और पुस्तकों में सिमट गए हैं।
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पुरानी काशी के चौखंभा स्थित ठठेरी बाजार की गली में बना भारतेंदु भवन पहले चौखंभा स्कूल के नाम से जाना जाता रहा। वहां उन्होंने एक विद्यालय स्थापित किया। 1868 में विद्यालय भारतेंदु जी ने सूड़िया में स्थानांतरित किया और बाद में 1895 में मैदागिन पर विद्यालय बना, जो हरिश्चंद्र महाविद्यालय, हरिश्चंद्र इंटर कॉलेज और कन्या कॉलेज खोला गया है।
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भारतेंदु हरिश्चंद्र के पौत्र दीपेश चौधरी ने बताया कि दादाजी के बारे में जितना हम लोगों ने सुना है, वह आश्चर्य लगता है। 5 वर्ष की अल्प आयु में ही दोहा लिखना। 35 साल में ही कई पत्रिकाओं व किताबों, नाटकों का रचनाकार बनना, अपने आप में अनोखी बात है।
स्कूली बच्चों को दिखाना चाहिए
दीपेश चौधरी ने बताया कि उनसे जुड़े बहुत सारे सामान और किताबें आज भी भारत कला भवन में हैं। जबकि उनकी डोली इत्यादि धरोहर के रूप में रखी हुई है। दादाजी हमेशा से ही रोजगार परक शिक्षा, विदेश यात्रा व पार्कों के सुंदरीकरण की प्राथमिकता देते थे।
उन्होंने बताया कि जिस तरह सरकार ने लमही में प्रख्यात लेखक मुंशी प्रेमचंद तो वही संगीत घराने के लिए जाने जाने वाली गली को हेरिटेज वाक बनाया है। उसी तरह भारतेंदु के नाम से भी एक पथ बनाने के साथ ही इस भवन को स्कूली बच्चों को लाकर दिखाना चाहिए। इससे उनकी यादें बच्चों के जीवन में ताजा रहेंगी, लोग उनकी रचनाओं की गंभीरता को समझेंगे।
उन्होंने बताया कि जिस तरह सरकार ने लमही में प्रख्यात लेखक मुंशी प्रेमचंद तो वही संगीत घराने के लिए जाने जाने वाली गली को हेरिटेज वाक बनाया है। उसी तरह भारतेंदु के नाम से भी एक पथ बनाने के साथ ही इस भवन को स्कूली बच्चों को लाकर दिखाना चाहिए। इससे उनकी यादें बच्चों के जीवन में ताजा रहेंगी, लोग उनकी रचनाओं की गंभीरता को समझेंगे।