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यहां होनी थी काशी की स्थापना, लेकिन अब गुप्त काशी के नाम से जाना जाता है यह स्थान

Thu, 09 Jul 2020 04:19 PM IST
गीतार्जुन गौतम अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी Published by: गीतार्जुन गौतम Updated Thu, 09 Jul 2020 04:19 PM IST
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Berasnath Dham is called name of guptkashi Kashi was to be established here in bhadohi
बेरासनाथ धाम। - फोटो : अमर उजाला।

काशी और प्रयागराज के मध्य स्थित भदोही जिला आध्यात्मिक लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। प्राचीन काल के कई धार्मिक स्थल यहां के आध्यात्मिक इतिहास की गवाही देते हैं। इन्हीं में से एक है कौलापुर क्षेत्र का बेरासनाथ धाम। 100 वर्ष से अधिक पुराने इस धाम को कालीन नगरी के गुप्त काशी के नाम से जाना जाता है। देवाधिदेव महादेव के प्रिय मास सावन में इस धार्मिक स्थल का महात्म्य दूर-दूर तक फैल जाता है।

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काशी-प्रयाग मध्य स्थित पवित्र क्षेत्र में काफी धार्मिक केंद्र हैं, जो अपने आप में कई ऐतिहासिक विरासत सहेजे हैं। गोपीगंज क्षेत्र के बेरासपुर गांव में एक ऐसा शिव मंदिर है, जहां की मान्यता काशी विश्वनाथ से कम नहीं है। भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यह स्थल काशी तो नहीं बन सका, लेकिन गुप्त काशी के नाम से आज भी प्रचलित है। इस शिव मंदिर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ दर्शन-पूजन के लिए पहुंचती है। मंदिर में दूर-दूर के भक्त आते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद भोलेनाथ पूरी करते हैं।
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मंदिर का इतिहास 
बेरासपुर गांव में स्थित यह प्राचीन शिव मंदिर बाबा बेरासनाथ धाम के नाम से क्षेत्र में प्रसिद्ध है। मंदिर की स्थापना के बारे में ग्रामीण बताते हैं कि इस मंदिर का शिवलिंग भी सेमराध नाथ की तरह एक कुंए में था। किंवदंतियों के अनुसार एक बार व्यासजी इसी जगह से जा रहे थे तो उनको यहां किसी दैवीय शक्ति की मौजूदगी का अहसास हुआ। फिर वे रुक गए और कुंए में स्थित शिवलिंग की पूजा करने लगे। उसके बाद ग्रामीणों ने भी पूजा पाठ शुरू कर दिया।

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व्यास जी के कई वर्ष तक इस जगह रहने के कारण इस स्थान का नाम व्यासपुर पड़ा। लेकिन, कालांतर में गांव का नाम बेरासपुर हो गया। व्यासजी के चले जाने के काफी वर्ष बाद ग्रामीणों ने कुएं में स्थित शिवलिंग को बाहर निकाल कर स्थापित करने की इच्छा जताई लेकिन ऐसा न हो सका। फिर कुछ वर्षों तक ग्रामीणों ने कुएं को पाटकर शिवलिंग के जगह ऊपर पूजा पाठ करना शुरू कर दिया।

मगर मंदिर व्यवस्थित न होने से श्रद्धालुओं को दिक्कत होती थी। इसी को ध्यान में रखकर गांव के महामानव बाला प्रसाद पाल 'साहब' जो रेलवे में कार्यरत थे, ने बाबा बेरासनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार का बीड़ा उठाया और इसको वर्ष 1938 में पूरा करा लिया। उस समय भारत-पाकिस्तान का बंटवारा नहीं हुआ था तो इस मंदिर के निर्माण में लाहौर से दर्जनों कारीगरों ने आकर कार्य किया। इसमें गांव के भी तमाम हिंदू-मुस्लिम लोगों ने काम किया था।

स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना
मंदिर को अंदर से देखने से एक अलग स्थापत्य कला का अनुभव होता है। मंदिर बाहर देखने से मंदिर जैसा लगता है, लेकिन अंदर गोलाकार है। मंदिर के निर्माण में बाला प्रसाद पाल 'साहब' के सहयोग को ग्रामीण कभी नहीं भुला सकते।
 
यहां होनी थी काशी की स्थापना
इस मंदिर के आध्यात्मिक महत्व के बारे में क्षेत्र के विद्वान स्व. प्रभुनाथ मिश्र ने अपनी काव्य रचना में बताया कि इस जगह काशी की स्थापना होनी थी, लेकिन पंचकोश की जमीन की कमी के कारण यहां काशी की स्थापना न हो सकी। और यह क्षेत्र गुप्त काशी के रूप में चर्चित हुआ।

प्रभुनाथ मिश्र ने बताया है कि जैसे काशी विश्वनाथ के पूर्व तरफ उत्तरवाहिनी गंगा है। वैसे ही बेरासनाथ धाम के पूर्व तरफ भी उत्तरवाहिनी गंगा बहती है। काशी में उत्तर तरफ से जैसे कोई एक पानी का स्रोत आकर गंगा में मिलता है। ठीक वैसे ही बेरासनाथ मंदिर से कुछ दूरी पर एक पानी का स्रोत भी गंगा में जाकर मिलता है। 

ग्रामीणों की आस्था का प्रमुख केंद्र
मंदिर के महात्म्य के बारे में गांव के वयोवृद्ध माताचरण मिश्र ने भी काफी चमत्कारिक और इसे गुप्त काशी होने की बात कही। माताचरण ने तो अपने बडे भाई प्रभुनाथ मिश्र के काव्य रचना को गाकर इस पवित्र स्थल को गुप्त काशी और पवित्र आध्यात्मिक क्षेत्र होने की बात कही। गांव के फूलचंद तिवारी ने इस मंदिर के महात्म्य के बारे में बताया कि हम लोग बचपन से ही बेरासनाथ मंदिर की महिमा को सुनते चले आ रहे हैं और कई ऐसी घटना भी देखी, जो किसी चमत्कार से कम नहीं।

फूलचंद ने एक संस्मरण साझा करते हुए कहा कि एक बार बारिश न होने से पूरे गांव वालों ने मिलकर मंदिर के शिवलिंग को पानी से डूबोना चाहते थे। मान्यता है कि ऐसे बारिश होती है। लेकिन सभी ग्रामीणों के प्रयास के बावजूद शिवलिंग पानी में नही डूबा।

हालांकि बाद में बारिश हुई और लोग काफी प्रसन्न हुए। रमेश पांडेय ने कहा कि यह शिव मंदिर हमारे पूर्वजों के समय से भी पहले का है। यहां पर पूजा पाठ करने वालों की सभी मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है। पिछले कई वर्षो से बेरासनाथ मंदिर प्रांगण में शारदीय नवरात्र में भव्य दुर्गा पूजन का आयोजन भी होता है। मंदिर प्रांगण में एक भव्य और विशाल पीपल का वृक्ष है, जो इस मंदिर की भव्यता को और बढ़ा देता है। मंदिर के पुजारी के रूप में पं. श्यामधर मिश्र समर्पित हैं।  

कैसे पहुंचें बेरासनाथ धाम
यह मंदिर सेमराधनाथ मंदिर से सात किमी पूर्व-उत्तर, तिलेश्वरनाथ से चार किमी दक्षिण-पश्चिम और बाबा पाडंवानाथ से पांच किमी दक्षिण तरफ गंगा के उत्तर वाहिनी तट पर स्थित है। वाराणसी-प्रयागराज हाईवे से गोपीगंज के समीप कौलापुर से सीधे सड़क धाम को जोड़ती है।

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