Independence Day 2021: बनारसी पान पर अंग्रेजों ने लगा दिया था प्रतिबंध, तिरंगा बर्फी भी लगा पाबंदी
अंग्रेजों को शक था कि स्वतंत्रता आंदोलन में पान की भी कोई भूमिका है इसलिए पान बेचने से लेकर खाने तक पर पाबंदी लगा दी गई थी। हली बार तिरंगे के रंग वाली तिरंगी बर्फी बनी तो अंग्रेजों के होश उड़ गए थे। तिरंगे पर रोक के दौर में लोग तिरंगी बर्फी हाथों में लिए घूमते थे।
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बनारसी पान और मिठाई ने भी आजादी की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। देश को आजाद कराने के लिए बनारस में युवा-बुजुर्ग सड़क पर लड़ रहे थे तो यहां की मिठाई, पान और तवायफें उनका हौसला बढ़ा रही थीं। उस दौर में पहली बार बनारस में ही तिरंगा बर्फी बनी। वहीं दुनिया भर में मशहूर बनारसी पान पर भी अंग्रेजों ने प्रतिबंध लगा दिया था।
वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ भट्टाचार्य बताते हैं कि अंग्रेजों को शक था कि स्वतंत्रता आंदोलन में पान की भी कोई भूमिका है इसलिए पान बेचने से लेकर खाने तक पर पाबंदी लगा दी गई थी। बावजूद इसके चोरी-चोरी घर-घर पान पहुंचता था। बनारसी पान की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मुंह में रखते ही घुल जाता है। इसमें लगाया जाने वाला कत्था, चूना और सुर्ती पानवाले घर में तैयार करते हैं। बनारस की रंग बिरंगी मिठाइयों का कोई जवाब नहीं है।
राम भंडार में पहली बार तिरंगे के रंग वाली तिरंगी बर्फी बनी तो अंग्रेजों के होश उड़ गए थे। तिरंगे पर रोक के दौर में लोग तिरंगी बर्फी हाथों में लिए घूमते थे। इसके बाद बनारस से ही जवाहर लड्डू, गांधी गौरव, मदन मोहन, वल्लभ संदेश, नेहरू बर्फी के रूप में राष्ट्रीय मिठाइयां सामने आईं।
तिरंगी बर्फी और तिरंगे जवाहर लड्डू में आज की तरह रंग का उपयोग नहीं हुआ था। हरे रंग के लिए पिस्ता, सफेद के लिए बादाम और केसरिया के लिए केसर का प्रयोग कर तिरंगे का रूप दिया गया था।
बनारस के चौक इलाके के प्रमुख बाजार दालमंडी की गली में आजादी के आंदोलन के दौर में राजेश्वरी बाई, जद्दन बाई से लेकर रसूलन बाई तक के कोठे पर संगीत की महफिलें सजती थीं। महफिलों में अंग्रेजों को देश से निकालने की रणनीति तय होती थी। मशहूर अभिनेत्री नरगिस की मां और संजय दत्त की नानी जद्दन बाई ने कोठे पर आए दिन अंग्रेजों के छापे से तंग आकर दालमंडी गली छोड़ दी थी।
ठुमरी गायिका राजेश्वरी बाई तो हर महफिल में अंतिम बंदिश ‘भारत कभी न बन सकेला गुलाम...’, गाना नहीं भूलती थीं। ‘फूलगेंदवा न मारो, मैका लगत जोबनवा में ...’, जैसे गीत से मशहूर हुई रसूलन बाई ने तो आभूषण तभी पहने जब देश आजाद हो गया। तवायफ दुलारी बाई के ललकारने पर उसके सबसे खास नन्हकू ने कई अंग्रेजों के सिर धड़ से अलग कर दिए थे। कजरी गायिका सुंदरी के प्रेमी नागर को अंग्रेजी सेना से मोर्चा लेने पर कालापानी की सजा हो गई। ‘स्वर जीवनी’ कही जाने वाली सिद्धेश्वरी देवी भी महफिलों में देश भक्ति के गीत जरूर गाती थीं।