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पहली मुलाकात में ही शौकत और कैफी ने जिंदगी साथ बिताने का लिया था फैसला

Sat, 23 Nov 2019 10:28 AM IST
स्‍वाधीन तिवारी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आजमगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आजमगढ़ Published by: स्‍वाधीन तिवारी Updated Sat, 23 Nov 2019 10:28 AM IST
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Azamgarh in shock at the demise of Shaukat Kaifi, who has brought fame to films and social world
मशहूर शायर कैफी आजमी और उनकी पत्नी शौकत कैफी - फोटो : अमर उजाला

फिल्मों और सामाजिक दुनिया में नाम रौशन करने वाली शौकत कैफी के निधन से आज़मगढ़ को एक बड़ा झटका लगा है। उनके निधन से सभी लोग मर्माहत है। मेजवां गांव में उनके निधन से सन्नाटा पसरा है और लोग उनके साथ बीते पलों को याद कर रहे हैं। जगह—जगह शोक सभा आयोजित किये जा रहे हैं।

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प्रगतिशील शायर कैफी आज़मी से शौकत की पहली मुलाकात एक ड्रामाई अंदाज़ में हैदराबाद के मुशायरे में हुई थी। उन दिनों अच्छे तरक्की पसंद अदीब और शोरा सरदार जाफरी, मेजाज मखदूम, मजरूह, साहिर, जां निशार अख्तर, जज़्बी और कैफी आज़मी थे। 

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यह सिर्फ मुलाकात ही नही थी, बल्कि अपनी पूरी जिंदगी उनके साथ बिताने का फैसला कर लिया। कैफी भी तकरीबन इसी कैफियत से दो दो चार थे। कैफी से शौकत की मुलाकात वर्ष 1941 में हुई थी, जब शौकत की उम्र 13 साल की थी। 
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शौकत को दुपट्टे रंगने और चुनने का बेपनाह शौक था। वे खुद कुर्ते के रंगों और डिजाइनों को अपने दुपट्टे पर उतार लेती थी। उन्होंने 1951 में पृथ्वी थियेटर ज्वाइन किया था। इस थियेटर उन्होंने शकुंतला, दीवार, पठान, गद्दार, आहुति, कलाकार, पैसा, किसान ड्रामा में काम किया। 

इसी तरह उन्होंने हकीकत, हीर रांझा, नयना, गर्म हवा, लोफर, स्वीकार, धूप छाँव, आंगन की कली, इस्पेक्टर ईगल, उमराव जान, रास्ते प्यार के, बाजार, बाजार, लोरी, अंजुमन सलाम बांबे आदि फिल्मो में काम किया है। 

शौकत जब पहली बार कैफी आज़मी के साथ मेजवा गांव आई तो यह गांव उनको रास नही आया। वापस मुंबई चली गई। लेकिन कैफी आज़मी हमेशा अपने गांव जाने की ज़िद करते थे। कैफी आज़मी को 1972 में जब फालिज का असर हुआ तो कैफी को अपना गांव सताने लगा । 

गांव में रास्ता न रहने पर कैफी शौकत को गांव तक डोली पर लेकर आये थे। इसके  उन्होंने 1979-80 के दशक में  कैफी जब शौकत के साथ आये तो वे लोग गांव के हो गए। और यहां फतेह मन्ज़िल बना कर रहने लगे।

स्थानीय निवासी शाह आलम कुरैशी ने कहा कि शौकत कैफी के निधन से फिल्मी और सामाजिक दुनिया दोनों का काफी नुकसान हुआ है। फिल्मो में उनके काम करने का तरीका अलग अंदाज में था। उनसे लोग सीख लिया करते थे।


मिजवां वेलफेयर सोसाइटी के प्रबंधक आशुतोष त्रिपाठी ने कहा कि शौकत कैफी के निधन मेजवा में लोग मर्माहत है और गांव की अपूर्णनीय क्षति हुई है। आज हमने एक अच्छे किरदार को खो दिया है।शुजात हुसैन ने कहा कि गांव हम सभी लोग शौकत कैफी को मम्मी कहा करते थे। जब भी वह मुम्बई से मेजवा गांव आती थी वह बच्चों के लिए कुछ न कुछ जैसे कपड़े और मिठाई लेकर आती थी और बच्चों को देती थी। मम्मी कैफी साहब के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती थी। मेजवा गांव की तरक्की में उनका काफी सहयोग रहा है।

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