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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Ajnala Incident 7th-generation arrives at BHU to trace ancestor who died in British violence 169 years ago

अजनाला कांड: 169 साल से नहीं मिला पुरखों को मोक्ष, पूर्वज का पता लगाने बीएचयू पहुंची 7वीं पीढ़ी

Fri, 17 Jul 2026 12:02 AM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Fri, 17 Jul 2026 12:02 AM IST
सार

Varanasi News: 169 साल पहले ब्रिटिश हिंसा में मृत पूर्वज का पता लगाने 7वीं पीढ़ी बीएचयू पहुंची। यहां परिवार के साथ आए चारों सदस्यों का डीएनए सैंपल लिया गया। 

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Ajnala Incident 7th-generation arrives at BHU to trace ancestor who died in British violence 169 years ago
तमिलनाडु से आए लोगों के सैंपल लेता कर्मी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सात पीढ़ी पहले हमारे पूर्वज अजनाला में अंग्रेजों की क्रूरता के शिकार हुए थे। 169 वर्षों के बाद भी उन 282 आत्माओं को शांति नहीं मिली, क्योंकि उनका अंतिम संस्कार नहीं हो पाया। सुना कि बीएचयू में अजनाला के शहीदों की अस्थियों और खोपड़ियों पर शोध करके उनकी पहचान और उनके परिवार को खोजा जा रहा है। तब तमिलनाडु के कृष्णागिरी से हम 2000 किलोमीटर दूर काशी आए।

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बीएचयू में पूछते हुए जंतु विज्ञान विभाग में पहुंचे। ज्ञान लैब में प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे से मुलाकात कर सच्चाई बताई तो यहां के शोधार्थियों ने परिवार के साथ आए चारों सदस्यों का डीएनए सैंपल लिया। अब इंतजार है कि जांच हो जाए तो फिर हम अपने शहीद पुरखे का अंतिम संस्कार और पिंडदान कर सकेंगे। ये बातें तमिलनाडु के कृष्णागिरी स्थित संथूर गांव से आए कार्तिकेश राजाराम तिवारी और उनके परिवार के लोगों ने कहीं।
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1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के ठीक पहले अजनाला हत्याकांड हुआ था। यह एक ऐसा इतिहास है जिसमें ब्रिटिश अत्याचारियों ने लोगों को उत्तर प्रदेश से तमिलनाडु तक पलायन करने तक मजबूर कर दिया था। इसी पलायन का हिस्सा था बीएचयू में आया ये तिवारी परिवार।
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बीएचयू के जंतु विज्ञान विभाग में बुधवार को आए परिवार ने बताया कि अजनाला में सैनिकों की हत्या के बाद ब्रिटिश सेना ने उनके परिवारों के खिलाफ वारंट जारी कर दिया। शहीदों के परिवारों को आतंकी कहा जाने लगा। इससे बचने के लिए कई परिवार उत्तर प्रदेश के रायबरेली (दुमताहर गांव) से भागकर दक्षिण भारत पहुंच गए। उनके पूर्वज 1857 के बाद यहां आकर बसे। प्रकाश पांडे उन शहीदों में से एक माने जाते हैं जिन्होंने अजनाला का नेतृत्व किया।

दक्षिण भारत के संथूर गांव में आजकल उत्तर भारत की मैंगो ग्राफ्टिंग बड़ी मशहूर है। अजनाला और अन्य दूसरे कारणों से घर छोड़कर संधूर गए लोगों ने कृष्णगिरी जिले को आम का सबसे बड़ा उत्पादक जिला बना दिया है।

कुएं में फेंकी गईं थीं 282 लाशें
एक अगस्त 1857 को अजनाला (पंजाब) के कालियांवाला कुएं में ब्रिटिश सेना ने 26वीं बंगाल नेटिव इंफेंट्री के विद्रोही सिपाहियों को निर्ममता से मार डाला था। सिर पर गोली मार कर 282 सैनिकों की लाशें कुएं में फेंकी गई थीं। 2012 में इतिहासकार सुरेंद्र कोचर के नेतृत्व में खोदाई के दौरान कंकाल, गोलियां, एपॉलेट और ईस्ट इंडिया कंपनी के सिक्के मिले थे। भारतीय वैज्ञानिकों की टीम प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे, डॉ. नीरज राय, डॉ. के थंगराज और डॉ. जे एस सेहरावत शामिल थे। इन्होंने दांतों और हड्डियों से डीएनए और स्टैबल आइसोटोप विश्लेषण किया। रिजल्ट आया कि ये शहीद पंजाब के स्थानीय नहीं बल्कि गंगा मैदान (उत्तर प्रदेश, बिहार आदि) से आए सैनिक थे। शहीदों की पहचान के बाद उनके परिजनों की तलाश शुरू हुई। लेकिन, ब्रिटिश औपनिवेशिक रिकॉर्ड्स ने कोई ठोस मदद नहीं की। अजनाला के 50 शहीदों के माइटोकॉन्ड्रियल डेटा तैयार किए जा चुके हैं। अब मिलान के लिए न्यूक्लियर डीएनए पर काम हो रहा है।

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