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कजरी स्त्रियों के जीवन में रंग भरने वाला सबसे प्रिय ऋतु गीत
amarujala.com,written by अनूप ओझा
Updated Tue, 25 Jul 2017 04:41 PM IST
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मशहूर लोक गायिका अजिता श्रीवास्तव
- फोटो : अमर उजाला
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लोक संगीत में दो तरह के ऋतु गीत पाए जाते हैं। फागुन में फाग (होरी) और सावन में कजरी। होरी पुरुष प्रधान गीत है तो कजरी स्त्रियों के कंठ का शृंगार। इन दोनों ही ऋतुओं का मानव जीवन पर कितना गहरा और गाढ़ा प्रभाव है, वह सावन और फागुन में गाए जाने वाले गीतों से परिलक्षित होता है।
भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां जब शहनाई पर कजरी की धुन बजाते थे, तो संगीत के लोक में शास्त्र निखर जाता था। कजरी की धुनों पर जब वो दमकशी लगाते थे, तब उनकी शहनाई के सुरों की गजब की कसक होती थी। यह कहना है मशहूर लोक गायिका अजिता श्रीवास्तव का...।
कारे बादरों के शोर, झूमते पवन की पुरवाई कजरी की उपज है। हर लोक में कजरी रची और गाई गई। विरह, प्रेम, मिलन और मनुहार को सुरों के जरिए व्यक्त करने के लिए कजरी कब से कंठ में समाई, यह बताना तो थोड़ा कठिन है लेकिन इसके प्रसंग महाभारत काल से ही मिलते हैं।
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गायिका अजिता श्रीवास्तव कजरी का नाम आते ही खुशी से झूम जाती हैं। वह कजरी की उत्पत्ति महाभारत काल से बताती हैं। उनके अनुसार आठवीं संतान की रक्षा के लिए वसुदेव भादों की अंधेरी रात में नंद के घर कृष्ण को पहुंचाकर जब नंदजा को ले आए थे और कंस ने जब नंदजा को पटकने की कोशिश की तब वह उसके हाथ से छूटकर विंध्याचल में जा गिरी थी। वही नंदजा विंध्याचली देवी के नाम से पूजी जाती हैं।
इनका एक नाम कज्जला भी है। इसी से कजरी की उत्पत्ति मानी जाती है। भादों कृष्ण पक्ष की द्वितीया को मिर्जापुर, बनारस में कज्जला देवी (विंध्यवासिनी) का जन्मोत्सव कजरी उत्सव के रूप में मनाया जाता है। उस रात रतजगा होता है। 80-90 के दशक तक रतजगा की रात मुहल्ले सजते थे।
चौराहों पर आमने-सामने कजरी होती थी। जवाबी कजरी, दंगली कजरी देखने, सुनने के लिए काशी नरेश बग्घी पर सवार हो कर निकलते थे। रात भर कजरी होती थी। वह बताती हैं कि लोक गीतों में कजरी ही ऐसी विधा है जिसमें अनेक धुनें पाई जाती हैं।
ककहरा, शायरी कजरी, ढुनमुनिया कजरी, चौलरिया कजरी, बारहमासा, चौमासा जैसे कजरी के प्रकार लोक मानस में मशहूर रहे हैं। वह शायरी कजरी गाती हैं- नाजुक दिल हुआ दीवाना मेरो बारे बलमू...। अजिता के अनुसार तब अखाड़ों से कई ऊर्दू शायर जुड़े होते थे, जो शृंगार प्रधान कजरी रचते थे। वह ढुनमुनिया कजरी का मुखड़ा सुनाती हैं- मोरे हरी के लाल...। इसी तरह धुनदार कजरी में कई धुनें एक साथ गाई जाती थीं लेकिन अब यह चलन बहुत कम हो गया है।
बारहमासा की कजरी बंदिश वह गुनगुनाती हैं- गोरिया कहे बलम हमरा के उंची अंटरिया चाही ना...। चढ़त आषाढ़ खेती बरिया चाही/हर हेंगा बरिअरिया चाही/ सावन ना रे भैया सावन ना हो, सावन झूले बदे के झूला कदम की डरिया चाही ना...।
इसी तरह सावन की फुहारों में भींगते हुए गाई जाने वाली कजरी की बानगी देखिए- हरे रामा सावन की आइल बहार बदरिया घिर घिर आइल ना...। आइ गइले सावन के महिनवा हो पियवा मोर पलटनिया...।
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भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां जब शहनाई पर कजरी की धुन बजाते थे, तो संगीत के लोक में शास्त्र निखर जाता था। कजरी की धुनों पर जब वो दमकशी लगाते थे, तब उनकी शहनाई के सुरों की गजब की कसक होती थी। यह कहना है मशहूर लोक गायिका अजिता श्रीवास्तव का...।
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कारे बादरों के शोर, झूमते पवन की पुरवाई कजरी की उपज है। हर लोक में कजरी रची और गाई गई। विरह, प्रेम, मिलन और मनुहार को सुरों के जरिए व्यक्त करने के लिए कजरी कब से कंठ में समाई, यह बताना तो थोड़ा कठिन है लेकिन इसके प्रसंग महाभारत काल से ही मिलते हैं।
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गायिका अजिता श्रीवास्तव कजरी का नाम आते ही खुशी से झूम जाती हैं। वह कजरी की उत्पत्ति महाभारत काल से बताती हैं। उनके अनुसार आठवीं संतान की रक्षा के लिए वसुदेव भादों की अंधेरी रात में नंद के घर कृष्ण को पहुंचाकर जब नंदजा को ले आए थे और कंस ने जब नंदजा को पटकने की कोशिश की तब वह उसके हाथ से छूटकर विंध्याचल में जा गिरी थी। वही नंदजा विंध्याचली देवी के नाम से पूजी जाती हैं।
इनका एक नाम कज्जला भी है। इसी से कजरी की उत्पत्ति मानी जाती है। भादों कृष्ण पक्ष की द्वितीया को मिर्जापुर, बनारस में कज्जला देवी (विंध्यवासिनी) का जन्मोत्सव कजरी उत्सव के रूप में मनाया जाता है। उस रात रतजगा होता है। 80-90 के दशक तक रतजगा की रात मुहल्ले सजते थे।
चौराहों पर आमने-सामने कजरी होती थी। जवाबी कजरी, दंगली कजरी देखने, सुनने के लिए काशी नरेश बग्घी पर सवार हो कर निकलते थे। रात भर कजरी होती थी। वह बताती हैं कि लोक गीतों में कजरी ही ऐसी विधा है जिसमें अनेक धुनें पाई जाती हैं।
ककहरा, शायरी कजरी, ढुनमुनिया कजरी, चौलरिया कजरी, बारहमासा, चौमासा जैसे कजरी के प्रकार लोक मानस में मशहूर रहे हैं। वह शायरी कजरी गाती हैं- नाजुक दिल हुआ दीवाना मेरो बारे बलमू...। अजिता के अनुसार तब अखाड़ों से कई ऊर्दू शायर जुड़े होते थे, जो शृंगार प्रधान कजरी रचते थे। वह ढुनमुनिया कजरी का मुखड़ा सुनाती हैं- मोरे हरी के लाल...। इसी तरह धुनदार कजरी में कई धुनें एक साथ गाई जाती थीं लेकिन अब यह चलन बहुत कम हो गया है।
बारहमासा की कजरी बंदिश वह गुनगुनाती हैं- गोरिया कहे बलम हमरा के उंची अंटरिया चाही ना...। चढ़त आषाढ़ खेती बरिया चाही/हर हेंगा बरिअरिया चाही/ सावन ना रे भैया सावन ना हो, सावन झूले बदे के झूला कदम की डरिया चाही ना...।
इसी तरह सावन की फुहारों में भींगते हुए गाई जाने वाली कजरी की बानगी देखिए- हरे रामा सावन की आइल बहार बदरिया घिर घिर आइल ना...। आइ गइले सावन के महिनवा हो पियवा मोर पलटनिया...।