फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Aile Nndi Svnwa not be pouring into domestic badariya ..

घरेले बदरिया घनघोर हो सवनवां में ना अइलें ननदी..

Sat, 06 Aug 2016 02:01 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी Updated Sat, 06 Aug 2016 02:01 AM IST
विज्ञापन
सावन जीवन में भी रंग भरता है और प्रकृति में भी। यह महीना उजड़े चमन को हरा भरा कर देता है। पौधों में नई पत्तियां, नए कल्ले फूटते हैं। तन-मन पर छाई उदासी की धूल धुल जाती है। सावन में प्रकृति सर्वत्र हरी दिखाई देने लगती है। मेघों के आगमन के साथ ही प्रकृति में एक खास तरह की खुशबू घुलने लगती है। महाकवि कालिदास ने लिखा है- मेघालोके भवति सुखिनोप्यन्यथावृत्तिचेत:। यानी पावस ऋतु के मेघ जीवन में सुख-संपन्नता लेकर आते है। मिर्जापुर, बनारस में इसी महीने कजरी गाई जाती है।
विज्ञापन



लोक गीतों में प्रेम-माधुर्य की धुनों पर आधारित कजरी का नाम सावन में घिरने वाली काली घटाओं के प्रतीक के रूप में किया गया है। काजल के समान काली घटाओं के चलते ही इस महीने में झूले पर पिया की याद में गाए जाने वाले लोक गीत का नाम कजरी पड़ा। यह कहना है कि बीएचयू के संगीत एवं मंच कला संकाय के गायन विभाग के शिक्षक डॉ. विजय कपूर का। उनका कहना है कि बनारस से भोजपुर तक कजरी खूब गाई जाती है। सावन की शुरुआत की कजरी से होती है। गांव, गांव में झूले पड़ जाते हैं। स्त्रियां झूला झूलने के साथ ही कजरी गाती हैं। खासकर मिर्जापुर की कजरी तो पूरे उत्तर भारत में सुरों की लोच और मिठास के लिए विख्यात है। घरेले बदरिया घनघोर हो सवनवां में ना अइलें ननदी...जैसी कजरी खूब गाई जाती है। घटाएं जब घिरने लगती हैं तब बरबस प्रियतम की याद आने लगती है। वह बताते हैं कि कजरी प्रेम विरह की उपज है। इसमें शृंगार की उभयपक्ष की झांकी हमें देखने को मिलती है। कहीं झूला झूलने के लिए उत्सुक भौजाई अपनी ननद से पूछती है कि हे ननद बादल उमड़े चले आ रहे हैं?
विज्ञापन



मैं सावन में कजरी खेलने कैसे जाऊंगी। कजरी की बंदिश वह गुनगुनाते हैं, कइसे खेले जइबू सावन में कजरिया/बदरिया घेरि आई ननदी...। इस पर ननद संवाद करते हुए कहती है कि आजकल का दिन मस्ती का है। कोई रास्ता रोकने लगेगा तब क्या करोगी? मत जाओ..। कजरी में वह इस भाव को इस तरह व्यक्त करती हैं- तूं त जात हऊ अकेली/ केहू संग ना सहेली/ गुंडा छेकि लीहें तोहरी डगरिया/ बदरिया घेरि आई ननदी...। संयोग शृंगार के साथ वियोग शृंगार की गंभीर अभिव्यंजना कजरी में मिलती है। पति के परदेस होने की वजह से विरह का सावन में पैदा होना स्वाभाविक है। विजय कपूर बताते हैं कि सावन में गाई जाने वाली कजरी का इतिहास बहुत पुराना है। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं कजरी खेलने की प्रथा है तो कहीं ढुनमुनिया खेलने की। कजरी खेलने का संबंध जलक्रीडा से भी है। वर्षा का जल सावन में जब जगह-जगह इकट्ठा हो जाता है, तब कजरी खेली जाती है। कजरी गायन मुख्यत: मिर्जापुर से शुरू होकर बनारस, पूर्वी उत्तर प्रदेश से बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड तक लंबे समय से होता रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed